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बुधवार, 23 मार्च 2016

अतिथि, पात्र और सरकार

हरियाणा के सरकारी स्कूल शिक्षकों की भारी कमी से जूझ रहे हैं और भर्तियाँ लटक रही हैं, खासकर पात्र और अतिथि को लेकर सरकार दुविधा में है । सरकार, पात्र अध्यापकों और अतिथि अध्यापकों का त्रिकोणा संघर्ष शिक्षा पर भारी पड़ रहा है ।
समस्या क्यों बने अतिथि अध्यापक 
हुड्डा सरकार हो या खट्टर सरकार अतिथि अध्यापक सभी के लिए गले की फंस बने हुए हैं । वर्तमान सरकार ने कठोर निर्णय लेकर चार हजार के लगभग अतिथि अध्यापकों को रिलीव भी किया, लेकिन मंत्री महोदय की जुबान, रेशनलाइजेशन न होने जैसे कारणों से इनकी वापसी हुई, हालांकि यह वापसी 31 मार्च तक है, लेकिन यह निश्चित नहीं की 31 मार्च 2015 के बाद भी इन्हें हटाया जाएगा । यह संदेह इस कारण भी है, क्योंकि समय सीमा पहले भी निर्धारित हुई है और फिर जिन कारणों को गिनाकर इनकी वापसी हुई, वे सब मौजूद हैं । अतिथि अध्यापक 10 वर्ष से स्कूलों में सेवा दे रहे हैं और इसी आधार पर नियमित होने की मांग कर रहे हैं, लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पाया क्योंकि अतिथि अध्यापकों की नियुक्ति नियमानुसार नहीं हुई । यह भर्ती महज तीन महीने के लिए थी, इसीलिए स्थानीय प्रतिभागियों को नियुक्त कर लिया गया । समस्या तब पैदा हुई जब तीन महीनों के लिए नियुक्त अध्यापकों को तीन महीनों बाद क्या, तीन साल बाद भी नहीं हटाया गया । अतिथि स्थायी होने का दवाब बनाने लगे । अप्रैल 2009 तक इन्हें पीरियड के हिसाब से वेतन दिया जाता था, लेकिन अप्रैल 09 के बाद इन्हें वार्षिक कांट्रेक्ट दे दिया गया । इसका विरोध हुआ क्योंकि उस समय तक पहली पात्रता परीक्षा आयोजित हो चुकी थी । अक्तूबर 2008 में पात्रता परीक्षा का परिणाम आ जाने पर, पात्र अध्यापकों का नया वर्ग पैदा हुआ और उनकी मांग थी कि अगर कांट्रेक्ट देना है तो नए सिरे से आवेदन हों, जिसमें सिर्फ पात्रों को मौका मिले, लेकिन सरकार ने उनकी नहीं सुनी । अप्रैल 2009 से लगातार पात्र और अतिथि कोर्ट में आमने-सामने हो चुके हैं । अतिथियों के बारे में हर बार कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात ।
अतिथियों के साथ सहानुभूति क्यों नहीं 
10 वर्ष एक लम्बा अरसा होता है । इतने वर्षों बाद किसी को नौकरी से निकालना उचित नहीं, लेकिन अतिथि अध्यापकों के मामले में यह बात लागू नहीं होती, क्योंकि इनकी भर्ती पूर्णतः अस्थायी है और इनकी नियुक्ति के पहले दिन के बाद यह निश्चित था कि इन्हें स्थायी भर्ती तक रहना है । इस दौरान पात्रता परीक्षाओं का आयोजन हुआ, स्थायी भर्तियाँ हुई अर्थात इन्हें स्थायी होने के मौके मिले । कुछ हुए भी, लेकिन जो नहीं हुए उन्हें स्थायी भर्ती के बाद जाना ही चाहिए । जिस पद के लिए पात्र अध्यापक उपलब्ध नहीं, उन पर अतिथियों को रखा जा सकता है, लेकिन जिस पद के लिए पात्र मौजूद हैं और वे स्क्रीनिंग और इंटरव्यू जैसी वाधाओं से गुजर रहे हैं, उन पर इन्हें नहीं रखा जाना चाहिए । सहानुभूति की आवश्यकता तो उन्हें है जो 2008 से पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण करके बेरोजगार हैं और उनके स्थान पर अतिथि 10 वर्ष से वेतन ले रहे हैं । 
सरकार की स्थिति 
इस मामले में सरकार की स्थिति संदिग्ध है । हुड्डा साहब तो डटकर कहते थे कि अपने हाथ से लगाया पौधा मैं उखड़ने नहीं दूंगा । मौजूदा शिक्षा मंत्री भी इन्हें स्थायी करने के लिए वचनबद्ध हैं । सोचने की बात यह है कि महत्त्वपूर्ण न्याय होता है या खुद का फैसला । अगर अहमियत खुद के फैसले की है तो यह लोकतंत्र नहीं राजतन्त्र है । हुड्डा साहब ने अपने राजसी फैसले के लिए लगातार भर्तियों को लटकाया, पदोन्नतियों को लटकाया और अब युवा वर्ग भाजपा सकरार से उम्मीद लगाए हुए है । भर्ती प्रक्रिया तेज हुई है, लेकिन निकट भविष्य में समस्या का समाधान होता नहीं दिख रहा । 
हल क्या हो 
कोर्ट के आदेशों की पालना होनी ही चाहिए, लेकिन अगर ऐसा हो तो एक बार फिर हालात नाजुक हो सकते हैं क्योंकि अध्यापकों की जो कमी जून-जुलाई में थी, वो अब भी है । उस विकट स्थिति से बचने के लिए सबसे पहले तो प्राथमिक अध्यापकों की लटक रही भर्ती पर सरकार को फैसला लेना होगा । इनसे कोर्ट के फैसले को मानने का शपथ पत्र लेकर ज्वाइनिंग करवाई जाए । प्राथमिक अध्यापकों से टीजीटी की और टीजीटी से पीजीटी की पदोन्नति हो । स्कूलों में बैठे पीजीटी को उठाकर वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालयों में भेजा जाए । कुछ हालात इससे सुधर जाएंगे । मई तक भर्ती पूरी कर ली जाए तो नए सत्र में शिक्षा की गाडी पटरी पर आ सकती है । 
(न्यूज़बल्क पत्रिका के फ़रवरी-मार्च अंक में प्रकाशित )
                   दिलबागसिंह विर्क
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