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शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

....... दरिंदा !!

 सभी साथियों को मेरा नमस्कार आप सभी के समक्ष पुन: उपस्थित हूँ प्रसिद्ध कवि भवानीप्रसाद मिश्र जी की रचना...... दरिंदा के के साथ उम्मीद है आप सभी को पसंद आयेगी.......!!

दरिंदा
आदमी की आवाज़ में
बोला

स्वागत में मैंने
अपना दरवाज़ा
खोला

और दरवाज़ा
खोलते ही समझा
कि देर हो गई

मानवता
थोडी बहुत जितनी भी थी
ढेर हो गई !

- - भवानीप्रसाद मिश्र

गुरुवार, 21 जुलाई 2016

फिर तुम्हारा साथ मिले न मिले - अनुषा मिश्रा


सालों पहले मुझे हो गई थी तुमसे मोहब्बत
जिसे अपने दिल में छुपाकर
काटा मैंने हर एक दिन
मेरे पास भले ही नहीं थे तुम
लेकिन तुमसे दूर नहीं थी मैं
आज जब मिले हो तुम मुझे
इतने सालों बाद तो
जी करता है कि आने वाले
हर पल को बिताऊं तुम्हारे साथ
तुम्हारेचेहरे को बसा लूं अपनी आंखों में
तुम्हारी खुशबू से महका लूं अपना मन
छुप जाऊं तुम्हारे सीने में मैं
समा जाऊं तुम्हारी सांसों में
हाथों में लेकर तुम्हारा हाथ
देखती रहूं तुम्हारी सूरत सारी रात
रख लो तुम मेरे कंधे पर सिर
खो जाऊं मैं तुम्हारी बातों में फिर
जी लूं हर एक लम्हे को जी भरकर
क्या पता फिर तुम्हारा साथ मिले न मिले !

लेखक परिचय - अनुषा मिश्रा

गुरुवार, 14 जुलाई 2016

हाथ में सब्र की कमान हो तो तीर निशाने पर लगता है - कविता रावत

धैर्य कडुवा लेकिन इसका फल मीठा होता है।
लोहा आग में तपकर ही फौलाद बन पाता है।।

एक-एक पायदान चढ़ने वाले पूरी सीढ़ी चढ़ जाते हैं।
जल्दी-जल्दी चढ़ने वाले जमीं पर धड़ाम से गिरते हैं।।

छटाँक भर धैर्य सेर भर सूझ-बूझ के बराबर होता है।
जल्दीबाजी में शादी करने वाला फुर्सत में पछताता है।।

उतावलापन बड़े-बड़े मंसूबों को चौपट कर देता है।
धैर्य से विपत्ति को भी वश में किया जा सकता है।।

हाथ  में सब्र की कमान हो तो तीर निशाने पर लगता है।
आराम-आराम से चलने वाला सही सलामत घर पहुँचता है।।

लेखक परिचय - कविता रावत 


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