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शनिवार, 19 नवंबर 2016

खुद से मुलाकात..अर्चना चावजी

कल मैं खुद ही खुद से मिली,
खुद को समझाया,
खुद को ही डाँटा,
खुद ही परेशान रही.
खुद से बातें की,
पर खुद को न बदल पाई,
कितनी मुश्किल है खुद से मुलाकात,
ये कल ही मैं जान पाई,
बहुत अच्छा लगा खुद से मिलकर,
लगा खुदा से मिल आई हूँ,
और अब मैं खुद ही खुद बने रहना चाहती हूँ ,
हे ईश्वर बस!..मुझे खुद ही बनकर जीने देना,
मैं खुद को नहीं बदल पाउँगी,
जब -जब मन करेगा तुझसे मिलने का
मैं खुद ही खुद में चली आउँगी......
तू मुझसे यूँ ही मिलते  रहना,
तभी खुद की तरह जीने के लिये..
तेरी बनाई दुनियाँ को मैं समझ पाउँगी...

लेखक परिचय - अर्चना चावजी

गुरुवार, 27 अक्तूबर 2016

अब ये खिड़कियाँ बंद रहती हैं - दिलीप

अब ये खिड़कियाँ बंद रहती हैं....
पहले बारिश की छीटें खटखटाती...
तो हवा खोल दिया करती थी खिड़कियाँ...
सब चाल थी तुम्हें खिड़की तक लाने की....
तुम्हारी छुवन घोल के ले जाती थी संग संग....
अब मंज़र बदल गया है....
हवा को डाँट देता हूँ...
वरना बारिश की छींटों के संग संग....
कुछ छीटें तुम्हारी भी आ जाती हैं....
पूरा कमरा भीग जाता है और संग संग आँखें भी....
बस इसीलिए
अब ये खिड़कियाँ बंद ही रहती हैं....

लेखक परिचय - दलीप 

बुधवार, 19 अक्तूबर 2016

......... क्या मैं 'जिंदा' हूँ -- शिवनाथ कुमार


  

क्या मैं 'जिंदा' हूँ
'नहीं' तो थोड़ा एहसास
थोड़ी राख 'अतीत' की
भर दे कोई
मेरी मुठ्ठी में
गीत कोई गा दे 'वही'
 फिर से मेरे कानों में
और हो सके तो
पिला दे कोई मुझे
अमर संस्कारों की अमृत
करा दे स्पर्श
माँ की चरणों का
और लगा दे कोई
मिटटी मेरे बचपन की
कि मैं जिंदा हो जाऊँ फिर से
और चाँद उगने लगे
मेरे घर की देहरी पर
एक बार फिर से
हाँ, वैसे ही फिर से

शिवनाथ कुमार जी की एक बेहतरीन रचना आज सभी के साथ साँझा कर रहा हूँ...........उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

-- संजय भास्कर

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

क्या मिला है देश को इस संविधान से - दिगंबर नासवा

इसलिए की गिर न पड़ें आसमान से
घर में छुप गए हैं परिंदे उड़ान से

क्या हुआ जो भूख सताती है रात भर
लोकतंत्र तो है खड़ा इमिनान से

चंद लोग फिर से बने आज रहनुमा
क्या मिला है देश को इस संविधान से

जीत हार क्या है किसी को नहीं पता
सब गुज़र रहे हैं मगर इम्तिहान से

है नसीब आज तो देरी न फिर करो
चैन तो खरीद लो तुम इस दुकान से

झूठ बोलते में सभी डर गए मगर
सच नहीं निकलता किसी की जुबान से

गुनाहगार को लगे या बेगुनाह को
तीर तो निकल ही गया है कमान से

लेखक परिचय -  दिगंबर नासवा

शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

....... दरिंदा !!

 सभी साथियों को मेरा नमस्कार आप सभी के समक्ष पुन: उपस्थित हूँ प्रसिद्ध कवि भवानीप्रसाद मिश्र जी की रचना...... दरिंदा के के साथ उम्मीद है आप सभी को पसंद आयेगी.......!!

दरिंदा
आदमी की आवाज़ में
बोला

स्वागत में मैंने
अपना दरवाज़ा
खोला

और दरवाज़ा
खोलते ही समझा
कि देर हो गई

मानवता
थोडी बहुत जितनी भी थी
ढेर हो गई !

- - भवानीप्रसाद मिश्र

गुरुवार, 21 जुलाई 2016

फिर तुम्हारा साथ मिले न मिले - अनुषा मिश्रा


सालों पहले मुझे हो गई थी तुमसे मोहब्बत
जिसे अपने दिल में छुपाकर
काटा मैंने हर एक दिन
मेरे पास भले ही नहीं थे तुम
लेकिन तुमसे दूर नहीं थी मैं
आज जब मिले हो तुम मुझे
इतने सालों बाद तो
जी करता है कि आने वाले
हर पल को बिताऊं तुम्हारे साथ
तुम्हारेचेहरे को बसा लूं अपनी आंखों में
तुम्हारी खुशबू से महका लूं अपना मन
छुप जाऊं तुम्हारे सीने में मैं
समा जाऊं तुम्हारी सांसों में
हाथों में लेकर तुम्हारा हाथ
देखती रहूं तुम्हारी सूरत सारी रात
रख लो तुम मेरे कंधे पर सिर
खो जाऊं मैं तुम्हारी बातों में फिर
जी लूं हर एक लम्हे को जी भरकर
क्या पता फिर तुम्हारा साथ मिले न मिले !

लेखक परिचय - अनुषा मिश्रा

गुरुवार, 14 जुलाई 2016

हाथ में सब्र की कमान हो तो तीर निशाने पर लगता है - कविता रावत

धैर्य कडुवा लेकिन इसका फल मीठा होता है।
लोहा आग में तपकर ही फौलाद बन पाता है।।

एक-एक पायदान चढ़ने वाले पूरी सीढ़ी चढ़ जाते हैं।
जल्दी-जल्दी चढ़ने वाले जमीं पर धड़ाम से गिरते हैं।।

छटाँक भर धैर्य सेर भर सूझ-बूझ के बराबर होता है।
जल्दीबाजी में शादी करने वाला फुर्सत में पछताता है।।

उतावलापन बड़े-बड़े मंसूबों को चौपट कर देता है।
धैर्य से विपत्ति को भी वश में किया जा सकता है।।

हाथ  में सब्र की कमान हो तो तीर निशाने पर लगता है।
आराम-आराम से चलने वाला सही सलामत घर पहुँचता है।।

लेखक परिचय - कविता रावत 


रविवार, 1 मई 2016

मजदूर दिवस

“ मजदूर ”
सर्द हवाओं का नहीं रहता 
खौफ मुझे 
और ना ही मुझे कोई 
गर्म लू सताती है 

आंधी, वर्षा और धूप का
 मुझे डर नहीं 
मुझे तो बस ये पेट की
 आग डराती है 

उठाते होओगे तुम 
आनंद जिन्दगी के
यहां तो जवानी 
अपना खून सूखाती है 

खून पसीना बहा कर भी 
फ़िक्र रोटी की 
टिड्डियों की फौज 
यहां मौज उड़ाती है 

पसीना सूखने से पहले 
हक़ की बात ?
हक़ मांगने पर मेहनत 
खून बहाती है 

रखे होंगे इंसानों ने 
नाम अच्छे – अच्छे 
मुझे तो “कायत” 
दुनिया मजदूर बुलाती है  
                      :- कृष्ण कायत
http://krishan-kayat.blogspot.com

बुधवार, 23 मार्च 2016

अतिथि, पात्र और सरकार

हरियाणा के सरकारी स्कूल शिक्षकों की भारी कमी से जूझ रहे हैं और भर्तियाँ लटक रही हैं, खासकर पात्र और अतिथि को लेकर सरकार दुविधा में है । सरकार, पात्र अध्यापकों और अतिथि अध्यापकों का त्रिकोणा संघर्ष शिक्षा पर भारी पड़ रहा है ।
समस्या क्यों बने अतिथि अध्यापक 
हुड्डा सरकार हो या खट्टर सरकार अतिथि अध्यापक सभी के लिए गले की फंस बने हुए हैं । वर्तमान सरकार ने कठोर निर्णय लेकर चार हजार के लगभग अतिथि अध्यापकों को रिलीव भी किया, लेकिन मंत्री महोदय की जुबान, रेशनलाइजेशन न होने जैसे कारणों से इनकी वापसी हुई, हालांकि यह वापसी 31 मार्च तक है, लेकिन यह निश्चित नहीं की 31 मार्च 2015 के बाद भी इन्हें हटाया जाएगा । यह संदेह इस कारण भी है, क्योंकि समय सीमा पहले भी निर्धारित हुई है और फिर जिन कारणों को गिनाकर इनकी वापसी हुई, वे सब मौजूद हैं । अतिथि अध्यापक 10 वर्ष से स्कूलों में सेवा दे रहे हैं और इसी आधार पर नियमित होने की मांग कर रहे हैं, लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पाया क्योंकि अतिथि अध्यापकों की नियुक्ति नियमानुसार नहीं हुई । यह भर्ती महज तीन महीने के लिए थी, इसीलिए स्थानीय प्रतिभागियों को नियुक्त कर लिया गया । समस्या तब पैदा हुई जब तीन महीनों के लिए नियुक्त अध्यापकों को तीन महीनों बाद क्या, तीन साल बाद भी नहीं हटाया गया । अतिथि स्थायी होने का दवाब बनाने लगे । अप्रैल 2009 तक इन्हें पीरियड के हिसाब से वेतन दिया जाता था, लेकिन अप्रैल 09 के बाद इन्हें वार्षिक कांट्रेक्ट दे दिया गया । इसका विरोध हुआ क्योंकि उस समय तक पहली पात्रता परीक्षा आयोजित हो चुकी थी । अक्तूबर 2008 में पात्रता परीक्षा का परिणाम आ जाने पर, पात्र अध्यापकों का नया वर्ग पैदा हुआ और उनकी मांग थी कि अगर कांट्रेक्ट देना है तो नए सिरे से आवेदन हों, जिसमें सिर्फ पात्रों को मौका मिले, लेकिन सरकार ने उनकी नहीं सुनी । अप्रैल 2009 से लगातार पात्र और अतिथि कोर्ट में आमने-सामने हो चुके हैं । अतिथियों के बारे में हर बार कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात ।
अतिथियों के साथ सहानुभूति क्यों नहीं 
10 वर्ष एक लम्बा अरसा होता है । इतने वर्षों बाद किसी को नौकरी से निकालना उचित नहीं, लेकिन अतिथि अध्यापकों के मामले में यह बात लागू नहीं होती, क्योंकि इनकी भर्ती पूर्णतः अस्थायी है और इनकी नियुक्ति के पहले दिन के बाद यह निश्चित था कि इन्हें स्थायी भर्ती तक रहना है । इस दौरान पात्रता परीक्षाओं का आयोजन हुआ, स्थायी भर्तियाँ हुई अर्थात इन्हें स्थायी होने के मौके मिले । कुछ हुए भी, लेकिन जो नहीं हुए उन्हें स्थायी भर्ती के बाद जाना ही चाहिए । जिस पद के लिए पात्र अध्यापक उपलब्ध नहीं, उन पर अतिथियों को रखा जा सकता है, लेकिन जिस पद के लिए पात्र मौजूद हैं और वे स्क्रीनिंग और इंटरव्यू जैसी वाधाओं से गुजर रहे हैं, उन पर इन्हें नहीं रखा जाना चाहिए । सहानुभूति की आवश्यकता तो उन्हें है जो 2008 से पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण करके बेरोजगार हैं और उनके स्थान पर अतिथि 10 वर्ष से वेतन ले रहे हैं । 
सरकार की स्थिति 
इस मामले में सरकार की स्थिति संदिग्ध है । हुड्डा साहब तो डटकर कहते थे कि अपने हाथ से लगाया पौधा मैं उखड़ने नहीं दूंगा । मौजूदा शिक्षा मंत्री भी इन्हें स्थायी करने के लिए वचनबद्ध हैं । सोचने की बात यह है कि महत्त्वपूर्ण न्याय होता है या खुद का फैसला । अगर अहमियत खुद के फैसले की है तो यह लोकतंत्र नहीं राजतन्त्र है । हुड्डा साहब ने अपने राजसी फैसले के लिए लगातार भर्तियों को लटकाया, पदोन्नतियों को लटकाया और अब युवा वर्ग भाजपा सकरार से उम्मीद लगाए हुए है । भर्ती प्रक्रिया तेज हुई है, लेकिन निकट भविष्य में समस्या का समाधान होता नहीं दिख रहा । 
हल क्या हो 
कोर्ट के आदेशों की पालना होनी ही चाहिए, लेकिन अगर ऐसा हो तो एक बार फिर हालात नाजुक हो सकते हैं क्योंकि अध्यापकों की जो कमी जून-जुलाई में थी, वो अब भी है । उस विकट स्थिति से बचने के लिए सबसे पहले तो प्राथमिक अध्यापकों की लटक रही भर्ती पर सरकार को फैसला लेना होगा । इनसे कोर्ट के फैसले को मानने का शपथ पत्र लेकर ज्वाइनिंग करवाई जाए । प्राथमिक अध्यापकों से टीजीटी की और टीजीटी से पीजीटी की पदोन्नति हो । स्कूलों में बैठे पीजीटी को उठाकर वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालयों में भेजा जाए । कुछ हालात इससे सुधर जाएंगे । मई तक भर्ती पूरी कर ली जाए तो नए सत्र में शिक्षा की गाडी पटरी पर आ सकती है । 
(न्यूज़बल्क पत्रिका के फ़रवरी-मार्च अंक में प्रकाशित )
                   दिलबागसिंह विर्क
                        ********

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

ले आए आरक्षण.....(कुँवर जी)

बड़ा दुखदायी वातावरण है (कुँवर जी)

जब से ये आंदोलन नामक अंधड़ हरियाणा से गुजरा है अलग ही मानसिक स्थिति हो गई। कितने ही दोस्त इस अंधड़ में उड़ से गए, हम भी शायद उनके लिए किसी गाड़ी सा जल गए हो पता नहीही।
हमारी जिन्दगी बहुत ज्यादा बड़ी तो नहीं लेकिन कई पल ऐसे आते है जो कई जिन्दगी का बोझ सा दे जाते है। हमारे मजबूत चौड़े कन्धे उन कुछ पल का बोझ उठाने में अक्षम होते है। हम लाचार से घुटने टेक देते है उन पलो के।
एक शिक्षक जो इस लुटेरे आंदोलन का हिस्सा नहीं था, उसका समर्थक भी नहीं था, उस अंधी आग के कारण का समर्थक भी नहीं था, वो शिक्षक कई दिन के घोषित अवकाश के बाद कैसे अपने विद्यालय में गया होगा। कैसे उसने अपनी कक्षा में प्रवेश किया होगा और कैसे किसी विद्यार्थी से आँखे मिलाई होगी।

जो शिक्षक इस दंगे के समर्थक है या किसी भी बहाने से उन दंगाईयो के बचाव के भी समर्थक है उन पर थू ही है। वो तो बेशर्मी से अपने कुकर्म का घमण्ड दिखाते फिरेंगे उनका कोई जिक्र ही नही है।

लेकिन जो इसके समर्थक नहीं थे रोना तो उनका है। एक कहावत है कि "समझणिये की मर हो सै" बहुत सही है। वो तो हर उसकी आँखों में जो उसको देख रहा होगा कितने सवाल देखेगा। कोई आँख पूछ रही होगी "कितनी गाड़िया जला कर आए गुरु जी" कोई पूछ रही होगी "कितनी दुकाने लूटी" तो कोई आँख हँस रही होगी ये कहते हुए कि "मास्टर जी; ले आए आरक्षण"।
मन रो रहा है। पता नहीं कैसी कैसी कल्पनाएँ मन में आ रही है।

जय हिन्द,जय भारत।
कुँवर जी।

शनिवार, 30 जनवरी 2016

.......एक बूंद इश्क -- रीना मौर्या


होंठो की खामोशी ने पलकों के
भीतर आँखों के कोर में
एक बूंद इश्क बना दिया .....
आँखों को ठंडक देते उस
एक बूंद इश्क ने सब कुछ
धुंधला सा कर दिया .....
उस धुंधलपन को साफ करने के लिए
जैसे ही पलकें झपकाई ...
वो एक बूंद इश्क आँखों से बहकर
गालों पर से ढुलकते हुए
धीरे से ना जाने कहाँ खो गया.......
जहाँ से वो एक बूंद इश्क गुजरा
वहां अब सिर्फ एक गीलेपन की रेखा है
कुछ वक्त में वो भी सुख जाएगी...
फिर उदास चेहरे ......
बुझे मन....
ठंडी आँखोंवाले चेहरे पर रह जाएगी
एक दिखावटी मुस्कान.....
अपने अपनों के लिए....
और मन में एक आस...
प्रेमसागर को पाने की...!!

-- रीना मौर्या 
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