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मंगलवार, 22 सितंबर 2015

मन के मुताबिक चलने से -- सदा जी


आराम से
थकने के बारे में
सोचा है कभी
इससे भी थक जाता है मन
हर चीज से थकान का अनुभव होता है
नहीं थकते हैं हम सिर्फ
मन के मुताबिक चलने से .....!!!

कभी खुश रहने की
अभिलाषा पूरी नहीं होती
खुशी हमेशा जाने क्‍यूं
दूर ही रहती है
कभी पा लेना
इच्छित वस्‍तु
खुशी को पाना क्षणभंगुर सा
अगले ही पल
बढ़ जाती है खुशी
दूसरे पड़ाव पर
वह नित नये
ठिकाने बदलती रहती ह‍ै
और हम
उसकी तलाश में हो लेते हैं ...!!! 


--  जी की एक बेहतरीन रचना 

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 24-09-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2108 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  2. खुशियों का पैमाना हर पल बदलता रहता है...बहुत सुन्दर और सार्थक रचना...

    उत्तर देंहटाएं
  3. नहीं थकते हैं हम सिर्फ
    मन के मुताबिक चलने से ...
    ..मन के गति सबसे तीव्र जो होती है ..

    उत्तर देंहटाएं

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