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बुधवार, 9 जुलाई 2014

मैं आज भी वही पुराने ज़माने की माँ हूँ -- साधना वैद


तुम्हारे लिए
मैं आज भी वही
पुराने ज़माने की माँ हूँ
मेरी बेटी
तुम चाहे मुझसे कितना भी
नाराज़ हो लो
तुम्हारे लिए
मेरी हिदायतें और
पाबंदियाँ आज भी वही रहेंगी
जो सौ साल पहले थीं
क्योंकि हमारा समाज,
हमारे आस-पास के लोग,
औरत के प्रति
उनकी सोच,
उनका नज़रिया
और उनकी मानसिकता
आज भी वही है
जो कदाचित आदिम युग में
हुआ करती थी !
आज कोई भी रिश्ता
उनके लिए मायने
नहीं रखता !
औरत महज़ एक जिस्म है
उनके तन की भूख
मिटाने के लिए !
एक सिर्फ तुम्हारे प्रबुद्ध
और आधुनिक
हो जाने से
पूरा समाज सभ्य
और उदार विचारों वाला
नहीं बन जाता !
आज भी हमारे आस-पास
तमाम अच्छे लोगों के बीच
ऐसे घिनौने लोग भी
छिपे हुए हैं
जिनकी सोच कभी
नहीं बदल सकती,
औरत को कुत्सित नज़र से
देखने की उनकी गंदी
मानसिकता नहीं बदल सकती
और उनके सामान्य से जिस्मों में
पलने वाला हैवानियत का
राक्षस नहीं मर सकता !
इसीलिये कहती हूँ
अपने दिमाग की खिड़कियाँ खोलो
देह के हिस्से नहीं !
अपने आत्मबल को संचित
करके रखो,
क्योंकि शारीरिक बल में
तुम उन दरिंदों से कभी
मुकाबला नहीं कर पाओगी
जो घात लगाये हर जगह
सरे राह और अब तो
चलती बसों, कारों
और ट्रेनों में भी  
तुम्हारे पीछे वहशी कुत्तों
की तरह पड़े रहते हैं !
अगर बदकिस्मती से
तुम्हारे साथ
कोई हादसा हो गया
तो तुम्हें जीने की
कोई राह नहीं मिलेगी बेटी
क्योंकि हम तुम लाख चाहें
कि इस हादसे का असर
तुम्हारे जीवन पर ना पड़े
लोग एक पल के लिए भी
तुम्हें वह हादसा
भूलने नहीं देंगे !
किसीके उलाहने और कटूक्तियाँ
तो किसीके व्यंगबाण,
किसीकी दयादृष्टि और संवेदना
तो किसीके सहानुभूति भरे वचन,
किसीके गुपचुप इशारे और संकेत
तो किसीके जिज्ञासा भरे सवाल
उस भयावह कृत्य को बार-बार
रिवाइंड कर हर पल हर लम्हा
तुम्हें फिर से उन्हें
जीने के लिए
विवश करते रहेंगे,
और तुम फिर कभी
सामान्य नहीं हो सकोगी
महज़ एक ‘ज़िंदा लाश’
बन कर रह जाओगी !
आज मेरे होंठों से निकली ये बातें
ज़रूर तुम्हें ज़हर सी कड़वी
लग रही होंगी
लेकिन बेटी बाद में
तुम्हारी आँखों से बरसते
आँसुओं के तेज़ाब को
मेरे ये होंठ ही पियेंगे
कोई और नहीं !
तुम्हारी राह रोके मेरे ये बाजू
जिन्हें झटक कर तुम आज
बाहर जाना चाहती हो
कल को यही तुम्हारे
रक्षा कवच बन
अपनी बाहों में समेट
तुम्हें पनाह देंगे
कोई और नहीं !
इसलिए आज तुम्हें अपनी
इस ‘दकियानूस’ माँ की
हर बात माननी पड़ेगी !  
दुनिया के किसी भी कोने में
तुम चली जाओ
आदमी आज भी हैवान ही
बना हुआ है और
इसका खामियाजा आज भी
औरत को ही उठाना पड़ता है !
शायद ऊपर वाले ने भी
उसे ही अपनी नाइंसाफी का
शिकार बनाया है !


लेखक परिचय -- साधना वैद


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