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शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

..... बड़ा विचित्र है नारी मन - मञ्जूषा पाण्डेय


बड़ा विचित्र है नारी मन
त्रिया चरित्र ये नारी मन
खुद से खुद को छिपाती
कितने राज बताती
अपने तन को सजाती
सब साज सिंगार रचाती
हया से घिर घिर जाती
जब देखती दर्पण
प्रियतम से रूठ कर
मोतियों सी टूट कर
फर्श पर बिखर गयी जो
अरमान अपने समेटे
अस्तित्व की चादर में लपेटे
सम्मुख सर्वस्व किया अर्पण
ममता की छावं  में
एक छोटे से गावं में
चांदनी के पालने में
लाडले को सुलाती
परियों की कहानियां
मीठी लोरियां सुनाती
नींद को देती आमंत्रण
खनकते हैं हाथ जिन चूड़ियों से
तलवारें पकड़ना भी जान गए
एक फूल से वो अंगार बनी
लोहा सब उसका मान गए
न रखती कोई भ्रम
दर्शाती अपना पराक्रम
एक भोली सी सूरत
बनी त्याग की मूरत
समझती सबकी जरूरत
अपने सपनों का घोंटती गला
इच्छाओं का करती दमन
बहती अविरल धारा सी
निर्मल गंगा सी है पावन
मन उसका छोटा सा
ओस की बूँद जितना
समाई है जिसमें सृष्टि
उसमें ओज है इतना
अदभुत है उसका रूप
दुर्लभ शक्तियों का है संगम
बड़ा विचित्र है नारी मन

-- मञ्जूषा पाण्डेय


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