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रविवार, 20 जुलाई 2014

क्योंकि मैं तुम्हारी माँ हूँ -- साधना वैद

( चित्र गूगल से साभार )
तुम्हारा उतरा हुआ चेहरा

तुम्हारे कुछ भी कहने से पहले
मुझसे बहुत कुछ कह जाता है ,
ऑफिस में तुम्हारी ज़द्दोजहद और
दिन भर खटते रहने की कहानी
तुम्हारी फीकी मुस्कुराहट की ज़बानी
बखूबी कह जाता है !
नाश्ते की प्लेट को अनदेखा कर
चाय की प्याली को उठा
दूसरे कमरे के एकांत में
तुम्हारा चुपचाप चले जाना ,
सुना जाता है आज दिन में
ऑफिस में बॉस से हुई
बेवजह तकरार का
दुःख भरा अफ़साना !
छोटे भाई को जब तुम
बिना गलती के अकारण ही
थप्पड़ जड़ देती हो ,
मैं समझ जाती हूँ कि इस तरह
तुम ऑफिस से लौटते हुए
बस में किसी शोहदे की छेड़खानी से क्षुब्ध
दुनिया भर की नफरत मन में पाले
अपने आप से ही लड़ लेती हो !
बंद आँखों की कोरों से उमड़ते
आँसुओं को छुपाने के लिये
जब तुम दुपट्टे से मुँह को ढक
अनायास ही करवट बदल लेती हो ,
मैं जान जाती हूँ कि
किसी खास दोस्त की
रुखाई से मिले ज़ख्मों को
छुपाने की कोशिश में तुम
किस तरह खुद को हर पल
हर लम्हा कुचल लेती हो !
तुम मुझसे कुछ नहीं कहतीं
शायद इसलिये क्योंकि तुम मुझे
इस उम्र में कोई और
नया दुःख देना नहीं चाहतीं ,
लेकिन मैं भी क्या करूँ
मेरी ममता और मेरी आँखे भी
इस तरह धोखे में रहना नहीं जानतीं !
मैं सब समझ लेती हूँ ,
मैं सब जान जाती हूँ ,
क्योंकि मैं तुम्हारी माँ हूँ .....!!!



4 टिप्‍पणियां:

  1. आजकल तो आप प्रतिदिन चौंका रहे हैं संजय ! बहुत-बहुत धन्यवाद एवं आभार मेरी रचना के चयन के लिये !

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