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मंगलवार, 24 जून 2014

मुझें अमरत्व की चाह है -- जानू बरुआ


सेठ बने है, जब फ़िक्र में थे तो लामलेट हो रहें थे |
जिसके भाग्य में लिखा वो बेफिकर होकर झेले...
हमें तो इन्तजार है उस सूरज का ,
जो चमके मेरे प्रताप से ......
और मैं उसकी परछाई में खोकर,
हर्षित हूँ लेकिन उसमें मैं कहीं, ना हूँ ...|

जो मदत-मदत कह रहा ,
उसके हाथ खुले है, उपकार को |
भय भीतर खा रहा ,
फिर भी उसे तो रोटी मिल बांटकर है, खानी |


झूट का भार कमर तोड़ रहा
लेकिन झूटे धन की चाह उसे नहीं....|
अभय मुर्ख, सत्य के अर्थ तलाशने को निकला है... |

कर्म की महत्ता से परिचित है,
उससे सत्य कहता है |
उसे आभास नहीं है,
मैं किस दिशा में हूँ ??

अगर वो मुझसे
कठिन- कठोर परिश्रम मांगेगी,
तो और आगे बढ चलूँगा,
मुझें अमरत्व की चाह है
 " अपने कर्मों से प्रप्ति संभव " |

लेखक परिचय -- जानू बरुआ  

शुक्रवार, 20 जून 2014

हो जाए ऐसा खुदा न खास्ता तो -- वंदना सिंह :)


हो जाए ऐसा खुदा न खास्ता तो 
याद आये भूला हुआ रास्ता तो 

नींदों में हमें है चलने कि आदत 
अगर शिद्दत से वो पुकारता तो

खामोशियों को जुबां हमने जाना 
कयामत ही होती गर बोलता तो

होता यूँ के टूटते बस भरम ही 
गर जाते में उसको टोकता तो

उसी कि नजर का जवाब हम थे 
आईने में खुद को निहारता तो

मर के भी मैं जी उठूंगा शायद 
दिया अपना जो उसने वास्ता तो



सोमवार, 16 जून 2014

.......... ज्यों नज़रें हुई चार :))


दो नैनों के जाल में
दिल हो गया बेकरार
दिल से  मिलकर दिल खिला
ज्यों नज़रें हुई चार .....!!!


लेखक परिचय -- डॉ निशा महाराणा 


रविवार, 8 जून 2014

....... प्रत्याशी :)



भीड़ तंत्र का एक भाग
घूम घूम करता प्रचार
पूर्ण शक्ति झोंक देता
चुनाव जीतने के लिए |
है वह आज का नेता
आज ही उतरा सड़क पर
लोगों से भेट करने
बड़ी बड़ी बातें करने |
वह थकता नहीं सभाओं में  प्रतिपक्ष की पोल बता
झूठे वादे करते
अपनी उपलब्धियां गिनवाते |
है केवल एक ही चिंता उसे
जितनी पूंजी झोंक रहा है
अगले पांच वर्ष में
 कैसे चौगुनी होगी |
कुर्सी से चिपके रहने की युक्ति
देशहित को परे हटाती  
वह खोज रहा अपना भविष्य
आने वाले कल में !

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