समर्थक

यह ब्लॉग हरियाणा के ब्लॉग लेखकों को एक मंच पर लाने के उद्देश्य से निर्मित किया गया है | हरियाणा के सभी ब्लॉग लेखकों से निवेदन है कि वे इस ब्लॉग से न सिर्फ जुड़ें अपितु अपनी पोस्ट से इसे समृद्ध बनाएँ अगर अलग से पोस्ट न लिख पाएँ तो अपने ब्लॉग पर लिखित पोस्ट का लिंक ही लगाकर भागेदारी बनाए रखें |
इस ब्लॉग से लेखक के रूप में जुड़ने के लिए -------- dilbagvirk23@gmail.com -------पर ईमेल करें |

LATEST:


विजेट आपके ब्लॉग पर

रविवार, 25 मई 2014

नीलकंठ


ब तक बना रहता नीलकंठ,
उगल दिया बरसों से गटका हुआ जहर,
तुम ही तो कहती थी,
"एक बार उगल दो ये सारा ज़हर"
और देखो बसंत नीला नहीं हुआ,
और ना ही पतझड़,
तुम्हारे पैरों के पास सिमटा,
बल्कि जहर के उगलने से जन्मा त्राहि,
तुम्हे भी निगल गया,
और अब मैं खोजता फिरता हूँ,
तुम्हारे पैरों के निशान,
जहाँ पतझड़ सिमट जाता था,
हाँ वहीँ जहाँ टेसू लहक कर जल उठा था,
और मेरा सारा जहर,
तुमने लील लिया था,
अब मौसम नहीं बदलता,
और ना ही बरसता है सावन,
ना ही आसमान नीला होता है,
और ना ही गुलमोहर तुम्हारे आने पर कोयल सा कूक उठता है,
बस पसरा हुआ है सन्नाटा,
वही सन्नाटा जो प्रलय के लय में तुम्हारे जाने पर पिघल गया था,
क्यूंकि तुम पी गयी प्रलय को,
और टेसू और कनेर दहकते रहते हैं,
तुम्हारे गीत गाते हुए,
और मैं अपना खाली कंठ लेकर,
भटकता रहता हूँ,
तुम्हारे इंतज़ार में,
कि जमीं हुई बर्फ पिघलेगी ,
औए मैं बह निकलूंगा फिर से,
टेसू से टपकते लावे में,
कनेर का पीलापन लिए,
सुन रही हो ना तुम,
नहीं भी सुन रही तो सुन लो,
अब मैं गुमशुदगी नहीं झेल सकता,
और ना ही बंद कमरे की उस आग में,
बाहर दहकते टेसू को जलते हुए छोड़ सकता हूँ.

- नीरज

2 टिप्‍पणियां:

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...
MyFreeCopyright.com Registered & Protected