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रविवार, 19 अक्तूबर 2014

यह क्या हुआ -- आशा सक्सेना


हरे भरे इस वृक्ष को
यह क्या हुआ
पत्ते सारे झरने लगे
सूनी होती डालियाँ |
अपने आप कुछ पत्ते
पीले भूरे हो जाते
हल्की सी हवा भी
सहन न कर पाते झर जाते
डालियों से बिछुड़ जाते |
डालें दीखती सूनी सूनी
उनके बिना
जैसे लगती खाली कलाई
चूड़ियों बिना |
अब दीखने लगा
पतझड़ का असर
मन पर भी
तुम बिन |
यह उपज मन की नहीं
सत्य झुटला नहीं पाती
उसे रोक भी
नहीं पाती |
बस सोचती रहती
कब जाएगा पतझड़
नव किशलय आएँगे
लौटेगा बैभव इस वृक्ष का |
हरी भरी बगिया होगी
और लौटोगे तुम
उसी के साथ
मेरे सूने जीवन में |

लेखक परिचय -- आशा सक्सेना 

शुक्रवार, 3 अक्तूबर 2014

विजय दशमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ ::)


म्हारा हरियाणा ब्लॉग की ओर से आप सभी ब्लोगर मित्रों को विजय दशमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ .....!!

 -- संजय भास्कर


रविवार, 21 सितंबर 2014

..... पहला प्यार :))


ज़िंदगी का पहला प्यार 
कौन भूलता  है
ये  पहली  बार होता  है  

जब कोई किसी को
खुद से बढ़कर 

चाहता है
उसकी पसंद उसकी ख्वाहिश 

में खुद को भूल जाता है
होता है इतना 

खूबसूरत पहला प्यार 
तो न जाने
क्यों अक्सर अधूरा रह जाता  है .....!!!


-- राज चौहान 

सोमवार, 15 सितंबर 2014

फांसी - श्याम कोरी 'उदय'


बहुत हो गया, एक काम करो -
चढ़ा दो
उसे फांसी पर !

क्यों, क्योंकि -
वह गांधीवादी तो है
पर तालीबानी गांधीवादी है !

वह अहिंसा का पुजारी तो है
पर हिटलर है !

वह बहुत खतरनाक है !
क्यों, क्योंकि -
वह खुद के लिए नहीं
आम लोगों के लिए लड़ रहा है !

ऐंसे लोग बेहद खतरनाक होते हैं
जो खुद के लिए न लड़कर
आम लोगों के लिए लड़ते हैं !

वह किसी न किसी दिन
हमारे लिए
खतरा साबित होकर रहेगा !

जितना बड़ा खतरा आज है
उससे भी कहीं ज्यादा बड़ा खतरा !

इसलिए -
जाओ, पकड़ के ले आओ उसे
ड़ाल दो, किसी अंधेरी काल कोठारी में !

और तो और, मौक़ा मिलते ही -
चढ़ा दो
उसे फांसी पर !!


लेखक परिचय -- श्याम कोरी 'उदय'


बुधवार, 13 अगस्त 2014

मेरा वजूद तुम संभाले रखना -- रीना मौर्या


मै रहूँ ना रहूँ तुम्हारी जिंदगी में 
मेरा वजूद तुम संभाले रखना 
मेरी यादें अपनी यादों में सजाकर रखना
कभी - कभी मुझे यादकर मुस्कुराते रहना 
जरुरी नहीं बंधन सात जन्मों का ही हो
मेरे अहसासों को गांठ बांधकर 
अपने सीने से लगाए रखना
पर कभी मुझे खुद से जुदा न करना
जब सब मिले मुझसे महफ़िल - ए - आम में सनम
तुम चुपके से कभी मेरी तनहाइयों से तो मिलना
जब सब डाले मेरे अंत शरीर पर फूल सनम 
सबके जाने के बाद तुम दो बूंद 
आँसू जरुर बहाना....
मुझे अपनी यादों में सजाना 
पर कभी मुझे खुद से जुदा मत करना....
मै रहूँ ना रहूँ तुम्हारी जिंदगी में 
मेरा वजूद तुम संभाले रखना
मेरी यादें अपनी यादों में सजाकर रखना 
पर कभी मुझे खुद से जुदा मत करना....!!




बुधवार, 30 जुलाई 2014

ओ काले मेघा { चोका }

प्यासी धरती 
तड़पे दिन-रात 
ओ काले मेघा !
सुनो जरा पुकार 
छा जाओ तुम 
ढक लो आसमान 
चाहते सभी 
ठंडी-ठंडी फुहार 
हरियाली हो 
पत्ता-पत्ता मुस्काए 
सूनी धरा का 
कर देना उद्धार 
तपन मिटे 
मादकता छा जाए 
अंग-अंग पे 
चढ़े नया खुमार 
ओ काले मेघा 
बरसो छमाछम 
देना ये उपहार |

दिलबाग विर्क 
*****

सोमवार, 28 जुलाई 2014

खाली पड़ा कैनवास -- शिवनाथ कुमार :)

@फोटो : गूगल से साभार

उस खाली पड़े कैनवास  पर
हर रोज सोचता हूँ
एक तस्वीर उकेरूँ
कुछ ऐसे रंग भरूँ
जो अद्वितीय हो
पर कौन सी तस्वीर बनाऊँ
जो हो अलग सबसे हटकर
अद्वितीय और अनोखी
इसी सोच में बस गुम हो जाता हूँ
ब्रश और रंग लिए हाथों में
पर उस तस्वीर की तस्वीर
नहीं उतरती मेरे मन में
जो उतार सकूँ कैनवास पर
वह रिक्त पड़ा कैनवास
बस ताकता रहता है मुझे हर वक्त
एक खामोश प्रश्न लिए
और मैं
मैं ढूँढने लगता हूँ जवाब
पर जवाब ...
जवाब अभी तक मिला नहीं
तस्वीर अभी तक उतरी नहीं
मेरे मन में
और वह खाली पड़ा कैनवास
आज भी देख रहा है मुझे
अपनी सूनी आँखों में खामोशी लिए  !!


 लेखक परिचय - शिवनाथ कुमार 








रविवार, 20 जुलाई 2014

क्योंकि मैं तुम्हारी माँ हूँ -- साधना वैद

( चित्र गूगल से साभार )
तुम्हारा उतरा हुआ चेहरा

तुम्हारे कुछ भी कहने से पहले
मुझसे बहुत कुछ कह जाता है ,
ऑफिस में तुम्हारी ज़द्दोजहद और
दिन भर खटते रहने की कहानी
तुम्हारी फीकी मुस्कुराहट की ज़बानी
बखूबी कह जाता है !
नाश्ते की प्लेट को अनदेखा कर
चाय की प्याली को उठा
दूसरे कमरे के एकांत में
तुम्हारा चुपचाप चले जाना ,
सुना जाता है आज दिन में
ऑफिस में बॉस से हुई
बेवजह तकरार का
दुःख भरा अफ़साना !
छोटे भाई को जब तुम
बिना गलती के अकारण ही
थप्पड़ जड़ देती हो ,
मैं समझ जाती हूँ कि इस तरह
तुम ऑफिस से लौटते हुए
बस में किसी शोहदे की छेड़खानी से क्षुब्ध
दुनिया भर की नफरत मन में पाले
अपने आप से ही लड़ लेती हो !
बंद आँखों की कोरों से उमड़ते
आँसुओं को छुपाने के लिये
जब तुम दुपट्टे से मुँह को ढक
अनायास ही करवट बदल लेती हो ,
मैं जान जाती हूँ कि
किसी खास दोस्त की
रुखाई से मिले ज़ख्मों को
छुपाने की कोशिश में तुम
किस तरह खुद को हर पल
हर लम्हा कुचल लेती हो !
तुम मुझसे कुछ नहीं कहतीं
शायद इसलिये क्योंकि तुम मुझे
इस उम्र में कोई और
नया दुःख देना नहीं चाहतीं ,
लेकिन मैं भी क्या करूँ
मेरी ममता और मेरी आँखे भी
इस तरह धोखे में रहना नहीं जानतीं !
मैं सब समझ लेती हूँ ,
मैं सब जान जाती हूँ ,
क्योंकि मैं तुम्हारी माँ हूँ .....!!!



बुधवार, 9 जुलाई 2014

मैं आज भी वही पुराने ज़माने की माँ हूँ -- साधना वैद


तुम्हारे लिए
मैं आज भी वही
पुराने ज़माने की माँ हूँ
मेरी बेटी
तुम चाहे मुझसे कितना भी
नाराज़ हो लो
तुम्हारे लिए
मेरी हिदायतें और
पाबंदियाँ आज भी वही रहेंगी
जो सौ साल पहले थीं
क्योंकि हमारा समाज,
हमारे आस-पास के लोग,
औरत के प्रति
उनकी सोच,
उनका नज़रिया
और उनकी मानसिकता
आज भी वही है
जो कदाचित आदिम युग में
हुआ करती थी !
आज कोई भी रिश्ता
उनके लिए मायने
नहीं रखता !
औरत महज़ एक जिस्म है
उनके तन की भूख
मिटाने के लिए !
एक सिर्फ तुम्हारे प्रबुद्ध
और आधुनिक
हो जाने से
पूरा समाज सभ्य
और उदार विचारों वाला
नहीं बन जाता !
आज भी हमारे आस-पास
तमाम अच्छे लोगों के बीच
ऐसे घिनौने लोग भी
छिपे हुए हैं
जिनकी सोच कभी
नहीं बदल सकती,
औरत को कुत्सित नज़र से
देखने की उनकी गंदी
मानसिकता नहीं बदल सकती
और उनके सामान्य से जिस्मों में
पलने वाला हैवानियत का
राक्षस नहीं मर सकता !
इसीलिये कहती हूँ
अपने दिमाग की खिड़कियाँ खोलो
देह के हिस्से नहीं !
अपने आत्मबल को संचित
करके रखो,
क्योंकि शारीरिक बल में
तुम उन दरिंदों से कभी
मुकाबला नहीं कर पाओगी
जो घात लगाये हर जगह
सरे राह और अब तो
चलती बसों, कारों
और ट्रेनों में भी  
तुम्हारे पीछे वहशी कुत्तों
की तरह पड़े रहते हैं !
अगर बदकिस्मती से
तुम्हारे साथ
कोई हादसा हो गया
तो तुम्हें जीने की
कोई राह नहीं मिलेगी बेटी
क्योंकि हम तुम लाख चाहें
कि इस हादसे का असर
तुम्हारे जीवन पर ना पड़े
लोग एक पल के लिए भी
तुम्हें वह हादसा
भूलने नहीं देंगे !
किसीके उलाहने और कटूक्तियाँ
तो किसीके व्यंगबाण,
किसीकी दयादृष्टि और संवेदना
तो किसीके सहानुभूति भरे वचन,
किसीके गुपचुप इशारे और संकेत
तो किसीके जिज्ञासा भरे सवाल
उस भयावह कृत्य को बार-बार
रिवाइंड कर हर पल हर लम्हा
तुम्हें फिर से उन्हें
जीने के लिए
विवश करते रहेंगे,
और तुम फिर कभी
सामान्य नहीं हो सकोगी
महज़ एक ‘ज़िंदा लाश’
बन कर रह जाओगी !
आज मेरे होंठों से निकली ये बातें
ज़रूर तुम्हें ज़हर सी कड़वी
लग रही होंगी
लेकिन बेटी बाद में
तुम्हारी आँखों से बरसते
आँसुओं के तेज़ाब को
मेरे ये होंठ ही पियेंगे
कोई और नहीं !
तुम्हारी राह रोके मेरे ये बाजू
जिन्हें झटक कर तुम आज
बाहर जाना चाहती हो
कल को यही तुम्हारे
रक्षा कवच बन
अपनी बाहों में समेट
तुम्हें पनाह देंगे
कोई और नहीं !
इसलिए आज तुम्हें अपनी
इस ‘दकियानूस’ माँ की
हर बात माननी पड़ेगी !  
दुनिया के किसी भी कोने में
तुम चली जाओ
आदमी आज भी हैवान ही
बना हुआ है और
इसका खामियाजा आज भी
औरत को ही उठाना पड़ता है !
शायद ऊपर वाले ने भी
उसे ही अपनी नाइंसाफी का
शिकार बनाया है !


लेखक परिचय -- साधना वैद


मंगलवार, 24 जून 2014

मुझें अमरत्व की चाह है -- जानू बरुआ


सेठ बने है, जब फ़िक्र में थे तो लामलेट हो रहें थे |
जिसके भाग्य में लिखा वो बेफिकर होकर झेले...
हमें तो इन्तजार है उस सूरज का ,
जो चमके मेरे प्रताप से ......
और मैं उसकी परछाई में खोकर,
हर्षित हूँ लेकिन उसमें मैं कहीं, ना हूँ ...|

जो मदत-मदत कह रहा ,
उसके हाथ खुले है, उपकार को |
भय भीतर खा रहा ,
फिर भी उसे तो रोटी मिल बांटकर है, खानी |


झूट का भार कमर तोड़ रहा
लेकिन झूटे धन की चाह उसे नहीं....|
अभय मुर्ख, सत्य के अर्थ तलाशने को निकला है... |

कर्म की महत्ता से परिचित है,
उससे सत्य कहता है |
उसे आभास नहीं है,
मैं किस दिशा में हूँ ??

अगर वो मुझसे
कठिन- कठोर परिश्रम मांगेगी,
तो और आगे बढ चलूँगा,
मुझें अमरत्व की चाह है
 " अपने कर्मों से प्रप्ति संभव " |

लेखक परिचय -- जानू बरुआ  

शुक्रवार, 20 जून 2014

हो जाए ऐसा खुदा न खास्ता तो -- वंदना सिंह :)


हो जाए ऐसा खुदा न खास्ता तो 
याद आये भूला हुआ रास्ता तो 

नींदों में हमें है चलने कि आदत 
अगर शिद्दत से वो पुकारता तो

खामोशियों को जुबां हमने जाना 
कयामत ही होती गर बोलता तो

होता यूँ के टूटते बस भरम ही 
गर जाते में उसको टोकता तो

उसी कि नजर का जवाब हम थे 
आईने में खुद को निहारता तो

मर के भी मैं जी उठूंगा शायद 
दिया अपना जो उसने वास्ता तो



सोमवार, 16 जून 2014

.......... ज्यों नज़रें हुई चार :))


दो नैनों के जाल में
दिल हो गया बेकरार
दिल से  मिलकर दिल खिला
ज्यों नज़रें हुई चार .....!!!


लेखक परिचय -- डॉ निशा महाराणा 


रविवार, 8 जून 2014

....... प्रत्याशी :)



भीड़ तंत्र का एक भाग
घूम घूम करता प्रचार
पूर्ण शक्ति झोंक देता
चुनाव जीतने के लिए |
है वह आज का नेता
आज ही उतरा सड़क पर
लोगों से भेट करने
बड़ी बड़ी बातें करने |
वह थकता नहीं सभाओं में  प्रतिपक्ष की पोल बता
झूठे वादे करते
अपनी उपलब्धियां गिनवाते |
है केवल एक ही चिंता उसे
जितनी पूंजी झोंक रहा है
अगले पांच वर्ष में
 कैसे चौगुनी होगी |
कुर्सी से चिपके रहने की युक्ति
देशहित को परे हटाती  
वह खोज रहा अपना भविष्य
आने वाले कल में !

रविवार, 25 मई 2014

नीलकंठ


ब तक बना रहता नीलकंठ,
उगल दिया बरसों से गटका हुआ जहर,
तुम ही तो कहती थी,
"एक बार उगल दो ये सारा ज़हर"
और देखो बसंत नीला नहीं हुआ,
और ना ही पतझड़,
तुम्हारे पैरों के पास सिमटा,
बल्कि जहर के उगलने से जन्मा त्राहि,
तुम्हे भी निगल गया,
और अब मैं खोजता फिरता हूँ,
तुम्हारे पैरों के निशान,
जहाँ पतझड़ सिमट जाता था,
हाँ वहीँ जहाँ टेसू लहक कर जल उठा था,
और मेरा सारा जहर,
तुमने लील लिया था,
अब मौसम नहीं बदलता,
और ना ही बरसता है सावन,
ना ही आसमान नीला होता है,
और ना ही गुलमोहर तुम्हारे आने पर कोयल सा कूक उठता है,
बस पसरा हुआ है सन्नाटा,
वही सन्नाटा जो प्रलय के लय में तुम्हारे जाने पर पिघल गया था,
क्यूंकि तुम पी गयी प्रलय को,
और टेसू और कनेर दहकते रहते हैं,
तुम्हारे गीत गाते हुए,
और मैं अपना खाली कंठ लेकर,
भटकता रहता हूँ,
तुम्हारे इंतज़ार में,
कि जमीं हुई बर्फ पिघलेगी ,
औए मैं बह निकलूंगा फिर से,
टेसू से टपकते लावे में,
कनेर का पीलापन लिए,
सुन रही हो ना तुम,
नहीं भी सुन रही तो सुन लो,
अब मैं गुमशुदगी नहीं झेल सकता,
और ना ही बंद कमरे की उस आग में,
बाहर दहकते टेसू को जलते हुए छोड़ सकता हूँ.

- नीरज

शुक्रवार, 16 मई 2014

लोकतंत्र

ब शब्द, वाक्य, बयान, सब पीछे रह गए हैं, रह गया है एक सन्नाटा, हाँ यह सन्नाटा ही तो है, जो सुनामी की तरह पल प्रति पल बढ़ता ही जा रहा है, ऊँची होती जा रही हैं उसकी लहरें, गहरे धंसती जा रही हैं उसकी जड़ें, रोक सको तो रोक लो,

मंगलवार, 6 मई 2014

तुम दीया हो, मैं हूं बाती सनम....प्रीती बङथ्वाल

हम एक सफर के,
साथी सनम,
तुम दीया हो,
मैं हूं बाती सनम,
दिल के चमन में,
जब खिलते गुलाब,
कांटों के संग,
खुशबू आती सनम।



जीवन में साथ,
निभाने की कसमें,
पत्थर में,
नाम लिखाने की रसमें,
वो दरख़तों के नीचे,
शाम बितानी सनम,
हम एक सफर के,
साथी सनम,
तुम दीया हो,
मैं हू बाती सनम।



खुली धूप में,
छत पे बातें बनाना,
कभी पलके उठना,
कभी, शरमा के झुकाना,
नजरों की नजर से,
आंखे बचाना,
यूं ही छुप-छुप के,
अपना मिलना सनम,
हम एक सफर के,
साथी सनम,
तुम दीया हो,
मैं हूं बाती सनम।
...........
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- साभार गूगल)

गुरुवार, 1 मई 2014

............ वक़्त की धारा -- क्षमा जी

कब,कौन पूछता मरज़ी उसकी,

अग्नी से, वो क्या जलाना चाहे है,
जहाँ लगाई,दिल या दामन,जला गयी!

कुम्हार आँगन बरसी जलभरी बदरी,
थिरक,थिरक गीले मटके  तोड़ गयी..
सूरज से सूखी खेती तरस गयी !

कलियों का बचपन ,फूलों की  जवानी,
वक़्त की निर्मम धारा बहा गयी,
थकी, दराज़ उम्र को पीछे छोड़ गयी...!!!


लेखक -- क्षमा जी

सोमवार, 21 अप्रैल 2014

..... पहले से उजाले -- क्षमा जी :)

छोड़ दिया देखना कबसे
अपना आईना हमने!
बड़ा बेदर्द हो गया है,
पलट के पूछता है हमसे
कौन हो,हो कौन तुम?
पहचाना नही तुम्हे!
जो खो चुकी हूँ मैं
वही ढूंढता है मुझमे !
कहाँसे लाऊँ पहलेसे उजाले
बुझे हुए चेहरेपे अपने?
आया था कोई चाँद बनके
चाँदनी फैली थी मनमे
जब गया तो घरसे मेरे
ले गया सूरज साथ अपने !!!

लेखक परिचय -- क्षमा जी

मंगलवार, 15 अप्रैल 2014

ना खुदाने सताया -- क्षमा जी

ना खुदाने सताया
ना मौतने रुलाया
रुलाया तो ज़िन्दगीने
मारा भी उसीने
ना शिकवा खुदासे
ना गिला मौतसे
थोडासा रहम  माँगा
तो वो जिन्दगीसे
वही ज़िद करती है,
जीनेपे अमादाभी
वही करती है...
मौत तो राहत है,
वो पलके चूमके
गहरी  नींद सुलाती है
ये तो ज़िंदगी है,
जो नींदे चुराती है
पर शिकायतसे भी
डरती हूँ उसकी,
गर कहीँ सुनले,
पलटके एक ऐसा
तमाचा जड़ दे
ना जीनेके काबिल रखे
ना मरनेकी इजाज़त दे......!!


लेखक -- क्षमा जी


शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

--- मुल्क खामोश क्यों है -- क्षमा जी

दिलों में खुशी की कोंपल नहीं,
फिर ये मौसमे बहार क्यों है?
सूखे पड़े हैं पेड़ यहाँ,
इन्हें परिंदों का इंतज़ार क्यों है?
गुलों में शहद की बूँद तक नहीं,
इन्हें भौरों का इंतज़ार क्यों है?
दूरदूर तक दर्याये रेत है,
मुसाफिर तुझे पानी की तलाश क्यों है?
बेहरोंकी इस बेशर्म बस्तीमे ,
हिदायतों का शोर क्यों है?
कहते हैं,अमन-औ चैन का मुल्क है,
यहाँ दनादन बंदूक की आवाज़ क्यों है?
औरतको  देवी कहते हैं इस देश में,
सरेआम इसकी अस्मत  लुटती  है,
मुल्क फिर भी खामोश क्यों है ?

लेखक -- क्षमा जी 

शुक्रवार, 28 मार्च 2014

.......रात नहीं होती -- राहुल जी

रात जो ठहर जाती है.
रात जो गुम हो जाती है.
रात जो परिंदों को ....
अपनी कहानियों का हिस्सा बनाती है..
शायद उस रात का अपना आशियाँ नहीं होता...
रात का अपना संबल नहीं होता.
बच्चे दूध की भीनी महक
रात में गुनगुनाते हैं...
कुछ सपने लड़कियों के ..
रात में टिमटिमाते हैं..
रात जो ठहर जाती है
रात जो सभी तिनकों को
अपने घोंसला में सजाती है ..
शायद उस रात का अपना मकान नहीं होता..
प्यार की चिट्ठियाँ रात में,
तन्हाई....रुसवाई  रात में,
अलबेली कायनात रात में,
पत्तों पर गिरती ओस....
 रात में बुनी जाती है ..
शायद उस रात का अपना कोई आइना नहीं होता
रात के सफ़र में यकीनन अपनी कोई ....
रात नहीं होती .......!!!


लेखक परिचय -- राहुल जी 

सोमवार, 10 मार्च 2014

....ख़ूबसूरत है वो दिल -- उर्मि जी


ख़ूबसूरत है वो दिल,
जो किसीके दर्द को समझे !

ख़ूबसूरत है वो एहसास,
जो किसीके दर्द का मरहम बने !

ख़ूबसूरत है वो जज़्बात,
जो किसीका एहसास करें !

ख़ूबसूरत है वो बातें,
जो किसीका दिल न दुखाएं !

ख़ूबसूरत है वो आँसू,
जो किसीके दर्द को महसूस करके बह जाएँ !

ख़ूबसूरत है वो हाथ,
जो किसीको मुश्किल वक़्त में थाम लें !

ख़ूबसूरत है वो कदम,
जो किसीकी मदद के लिए आगे बढ़ें !

ख़ूबसूरत है वो सोच,
जो किसीके लिए अच्छा सोचे !


लेखक परिचय - उर्मि जी 

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

शिवरात्रि के पावन अवसर पर सभी को हार्दिक शुभकामनायें :)


म्हारा हरियाणा ब्लॉग की और शिवरात्रि के पावन अवसर पर 
आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें....!!


-- संजय भास्कर 


शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2014

माँ रह गई उसी गाँव के कच्चे मकान में -- प्रीती सुमन

पढ़-लिख के बेटे बन गये अफसर जहान में ।
माँ रह गई उसी गाँव के कच्चे मकान में ।।


खिल-खिल के फूल चढ़ गये मंदिर में शान से ,
बस बच गये सूखे हुए पत्ते बगान में ।।














लेखक-- प्रीती सुमन   

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

.......पर आँखें नहीं भरीं - शिवमंगल सिंह सुमन

कितनी बार तुम्हें देखा
पर आँखें नहीं भरीं।

सीमित उर में चिर-असीम
सौंदर्य समा न सका
बीन-मुग्ध बेसुध-कुरंग
मन रोके नहीं रुका
यों तो कई बार पी-पीकर
जी भर गया छका
एक बूँद थी, किंतु,
कि जिसकी तृष्णा नहीं मरी।
कितनी बार तुम्हें देखा
पर आँखें नहीं भरीं।

शब्द, रूप, रस, गंध तुम्हारी
कण-कण में बिखरी
मिलन साँझ की लाज सुनहरी
ऊषा बन निखरी,
हाय, गूँथने के ही क्रम में
कलिका खिली, झरी
भर-भर हारी, किंतु रह गई
रीती ही गगरी।
कितनी बार तुम्हें देखा
पर आँखें नहीं भरीं।

-- शिवमंगल सिंह सुमन

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

..... बड़ा विचित्र है नारी मन - मञ्जूषा पाण्डेय


बड़ा विचित्र है नारी मन
त्रिया चरित्र ये नारी मन
खुद से खुद को छिपाती
कितने राज बताती
अपने तन को सजाती
सब साज सिंगार रचाती
हया से घिर घिर जाती
जब देखती दर्पण
प्रियतम से रूठ कर
मोतियों सी टूट कर
फर्श पर बिखर गयी जो
अरमान अपने समेटे
अस्तित्व की चादर में लपेटे
सम्मुख सर्वस्व किया अर्पण
ममता की छावं  में
एक छोटे से गावं में
चांदनी के पालने में
लाडले को सुलाती
परियों की कहानियां
मीठी लोरियां सुनाती
नींद को देती आमंत्रण
खनकते हैं हाथ जिन चूड़ियों से
तलवारें पकड़ना भी जान गए
एक फूल से वो अंगार बनी
लोहा सब उसका मान गए
न रखती कोई भ्रम
दर्शाती अपना पराक्रम
एक भोली सी सूरत
बनी त्याग की मूरत
समझती सबकी जरूरत
अपने सपनों का घोंटती गला
इच्छाओं का करती दमन
बहती अविरल धारा सी
निर्मल गंगा सी है पावन
मन उसका छोटा सा
ओस की बूँद जितना
समाई है जिसमें सृष्टि
उसमें ओज है इतना
अदभुत है उसका रूप
दुर्लभ शक्तियों का है संगम
बड़ा विचित्र है नारी मन

-- मञ्जूषा पाण्डेय


बुधवार, 29 जनवरी 2014

......... ख्वाबों के पेड़ -- दिगंबर नासवा

मेरे जिस्म की
रेतीली बंजर ज़मीन पर
ख्वाब के कुछ पेड़ उग आए हैं
बसंत भी दे रहा दस्तक
चाहत के फूल मुस्कुराए हैं

भटक रहे हैं कुछ लम्हे
तेरी ज़मीन की तलाश में
बिखर गये हैं शब्दों के बौर
तेरे लबों की प्यास में

अब हर साल शब्दों के
कुछ नये पेड़ उग आते हैं
नये मायनों में ढल कर
रेगिस्तान में जगमगाते हैं

अभिव्यक्ति की खुश्बू को
बरसों से तेरी प्रतीक्षा है

सुना है बरगद का पेड़
सालों साल जीता है .... !!


दिगम्बर नासवा जी की एक बेहतरीन रचना आज सभी के साथ साँझा कर रहा हूँ...........उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

-- संजय भास्कर

शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

........ तेरे आने से -- रीना मौर्या



तेरे आने से रोशन मेरा जहाँ हो गया
तेरे प्यार से महकता आशियाँ हो गया .....
तेरी आदाएं कोमल तितली सी है
तेरे आने से मेरा जीवन गुलिस्ताँ हो गया....

रंग इतने लाई है तू जीवन में मेरे
की अब हर शमाँ रंगीन हो गया ....
सादगी तेरे व्यवहार की ऐसी मनमोहक है
की मै तो तुझमे ही खो गया .....

यूँ शुभ कदमों से तू मेरे घर आई है
की मेरा घर , अब घर नहीं जन्नत हो गया .....
भोर की पहली किरण के साथ ही 
तेरा मधुर आवाज में कृष्ण को पुकारना
मेरा मंदिर , मंदिर नहीं गोकुलधाम हो गया ......

हे प्रिय, हे गंगा, हे तुलसी, हे लक्ष्मी
और किस - किस नाम से पुकारूँ मै तुझे
तेरी भोली सीरत पर मै तो  फ़ना हो गया...
तेरे आने से रोशन मेरा जहाँ हो गया
तेरे प्यार से महकता आशियाँ हो गया ....!

रीना मौर्या जी की एक बेहतरीन रचना आज सभी के साथ साँझा कर रहा हूँ...........उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

-- संजय भास्कर

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