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शनिवार, 23 नवंबर 2013

खाक के धुएं यादों से लिपट कर रोज़ रोते हैं।



कुछ शब्द रह गए थे दरिया किनारे,
कुछ यादें अब भी बाबस्ता देखा करती हैं,
तेरा रास्ता,
और उग आता है दूबों का जंगल,
निर्जनता के झींगुरों की आवाज़ में,
अब भी यादें बिखरी पड़ी हैं,
जो रातरानी बनकर खनक पड़ती हैं,
रातों में,
और मैं रात भर,
देखा करता हूँ,
वह पतली सी लीख,
जिसके सहारे तुम चली गयी थी,
कभी न लौटने के लिए,
लेकिन कहाँ से लाऊं मैं वह मन,
जो रोक सके आँखों को जगने से,
और न देखे तुम्हारे सपने,
ना सुने तुम्हारी आहट,
और निकाल कर फेंक दे तुम्हारी सारी यादें,
और एक चिता बनाकर जला सके तुमको, तुम्हारी यादों को,
ख़ाक में बदलने के लिए,
लेकिन सुना है,
"खाक के धुएं यादों से लिपट कर रोज़ रोते हैं।"

- नीरज  

बुधवार, 13 नवंबर 2013

.............. .....साँवली बिटिया -- रीना मौर्या

रंग सांवला बिटिया का 
कैसे ब्याह रचाऊँगा 
बेटे जो होते सांवले...
शिव और कृष्णा उन्हें बनाता 
बेटी को क्या उपमा दिलाऊंगा ....

पढ़ी लिखी संस्कारी है वो
गुणों से सुसज्जित न्यारी है वो
मेरी तो राजदुलारी है वो
पर अपने रंग से थोड़ा सा लजाई है वो .......

गोरा तो गोरी ही चाहे
काले को भी गोरी ही मनभाए
सांवल किसी को क्यूँ ना सुहाए
प्रेम का रंग क्यूँ कोई देख ना पाए ......

वो भी सृजन है देवों का
करुणा , ममता उसमे भी है
घर की लक्ष्मी भी बन दिखाएगी वो
ग़र समझो उसे की वो अपनी है....

सांवली है पर संध्या है वो..
भोर की पहली सांवली बदरिया है वो
मेरी तो राजदुलारी है वो
सांवल है तो क्या??
बिटिया बड़ी ही प्यारी है वो......

पढ़ी लिखी संस्कारी है वो
गुणों से सुसज्जित न्यारी है वो.... !!!


रीना मौर्या जी की एक बेहतरीन रचना आज सभी के साथ साँझा कर रहा हूँ...........उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

-- संजय भास्कर


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