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बुधवार, 2 अक्तूबर 2013

ग़ालिब ये इश्क नहीं आसां.......

सीलन से भरे उस कमरे में अँधेरा भरा हुआ था, रोशनी का एक छोटा सा भी टुकड़ा आने की जगह नहीं थी वहां, एक कोने में एक ऐश ट्रे और सिगरेट के कईयों टुकड़े बिखरे पड़े थे, एक जलती हुई सिगरेट अभी भी ऐश ट्रे के मुह पर आग जला रही थी और धुएं की एक धार एक सरल रेखा में ऊपर जाती हुई बिखर जाती थी और फिर उसके टुकड़े तलाशना शुरू कर देता था वो, धुएं का एक टुकड़ा पकड़ते ही उसकी आँखें चमक उठती थी, लेकिन यह क्या, हाथ खोलते ही बिखर जाता था वह टुकड़ा फिर कई टुकड़ों में, और वह भौंचक होकर देखता और अपने बाल खुजाकर फिर से तन्मयता से लग जाता टुकड़े पकड़ने में, आखिर हारकर उसने सिगरेट पीनी शुरू कर दी और फूँक फूँक कर तोड़ डाले सारे टुकड़े, पूरा कमरा कसैले धुएं से भर गया, अब वह जोर जोर से सांसें लेकर भर रहा था वह कसैलापन अपने फेंफडों में, कभी कभी कडवापन मिठास से ज्यादा राहत देती है, फिर उसने अपनी आँखें बंद कर ली थी और धुएं के छल्ले रह रह कर मुह से निकल जाते थे, गोल गोल ऊपर जाते बिखरते हुए, महीन हवा की चादर पर अपनी छाप छोड़ते हुए अनमने से छल्ले, ज़िन्दगी के छल्ले, हारे हुए छल्ले, टूटते हुए छल्ले, जीवन भी तो कुछ ऐसा ही है, छल्ले बनता हुआ, बड़ा होता हुआ अंततः टूट जाने के लिए, उसकी आँखों से एक आंसूं चुपके से ढलका और पूरा कमरा पानी पानी हो गया, सीलन की बूँदें पानी का अंगार बनकर बरसने लगी और पल भर में पूरा कमरा जलमग्न हो गया सिगरेट मिश्रित कसैले पानी से और वह उसके ऊपर तैरता हुआ बेहरकत..............................बहते हुए एक छोटे से दरवाज़े से बाहर निकल गया, कमरा जस का तस, सिगरेट और ऐश ट्रे सब गायब, रूह जा चुकी थी, रौशनी ने वहां अनेकों धमाके किये थे और हर कोना सफ़ेद होकर नहा गया था,सीलन ख़त्म हो गयी थी और खिडकियों से लगे परदे बहती हवा से लहरा कर उड़ रहे थे, सब कुछ दिव्य और एक कोने पर गमले में परिजात खिला हुआ था।

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