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गुरुवार, 24 अक्तूबर 2013

मन के मुताबिक चलने से -- सदा जी

आराम से
थकने के बारे में
सोचा है कभी
इससे भी थक जाता है मन
हर चीज से थकान का अनुभव होता है
नहीं थकते हैं हम सिर्फ
मन के मुताबिक चलने से .....!!!

कभी खुश रहने की
अभिलाषा पूरी नहीं होती
खुशी हमेशा जाने क्‍यूं
दूर ही रहती है
कभी पा लेना
इच्छित वस्‍तु
खुशी को पाना क्षणभंगुर सा
अगले ही पल
बढ़ जाती है खुशी
दूसरे पड़ाव पर
वह नित नये
ठिकाने बदलती रहती ह‍ै
और हम
उसकी तलाश में हो लेते हैं ...!!! 


--  जी की एक बेहतरीन रचना 



सोमवार, 14 अक्तूबर 2013

........है जिंदगी एक छलावा -- श्रीमती आशा लता सक्सेना जी :)



है जिंदगी एक छलावा
पल पल रंग बदलती है
है जटिल स्वप्न सी
कभी स्थिर नहीं रहती |
जीवन से सीख बहुत पाई
कई बार मात भी खाई
यहाँ अग्नि परीक्षा भी
कोई यश न दे पाई |
अस्थिरता के इस जालक में
फँसता गया ,धँसता गया
असफलता ही हाथ लगी
कभी उबर नहीं पाया |
रंग बदलती यह जिंदगी
मुझे रास नहीं आती
जो सोचा कभी न हुआ
स्वप्न बन कर रह गया |
छलावा ही छलावा
सभी ओर नज़र आया
इससे कैसे बच पाऊँ
विकल्प नज़र नहीं आया  !!

--  आशा लता सक्सेना 


शुक्रवार, 4 अक्तूबर 2013

........क्या गुनाह किया :))


ज़माने ने रुलाया है हमको ,
एक अपने ने रुला दिया तो क्या गुनाह किया !!


-- संजय भास्कर  


बुधवार, 2 अक्तूबर 2013

ग़ालिब ये इश्क नहीं आसां.......

सीलन से भरे उस कमरे में अँधेरा भरा हुआ था, रोशनी का एक छोटा सा भी टुकड़ा आने की जगह नहीं थी वहां, एक कोने में एक ऐश ट्रे और सिगरेट के कईयों टुकड़े बिखरे पड़े थे, एक जलती हुई सिगरेट अभी भी ऐश ट्रे के मुह पर आग जला रही थी और धुएं की एक धार एक सरल रेखा में ऊपर जाती हुई बिखर जाती थी और फिर उसके टुकड़े तलाशना शुरू कर देता था वो, धुएं का एक टुकड़ा पकड़ते ही उसकी आँखें चमक उठती थी, लेकिन यह क्या, हाथ खोलते ही बिखर जाता था वह टुकड़ा फिर कई टुकड़ों में, और वह भौंचक होकर देखता और अपने बाल खुजाकर फिर से तन्मयता से लग जाता टुकड़े पकड़ने में, आखिर हारकर उसने सिगरेट पीनी शुरू कर दी और फूँक फूँक कर तोड़ डाले सारे टुकड़े, पूरा कमरा कसैले धुएं से भर गया, अब वह जोर जोर से सांसें लेकर भर रहा था वह कसैलापन अपने फेंफडों में, कभी कभी कडवापन मिठास से ज्यादा राहत देती है, फिर उसने अपनी आँखें बंद कर ली थी और धुएं के छल्ले रह रह कर मुह से निकल जाते थे, गोल गोल ऊपर जाते बिखरते हुए, महीन हवा की चादर पर अपनी छाप छोड़ते हुए अनमने से छल्ले, ज़िन्दगी के छल्ले, हारे हुए छल्ले, टूटते हुए छल्ले, जीवन भी तो कुछ ऐसा ही है, छल्ले बनता हुआ, बड़ा होता हुआ अंततः टूट जाने के लिए, उसकी आँखों से एक आंसूं चुपके से ढलका और पूरा कमरा पानी पानी हो गया, सीलन की बूँदें पानी का अंगार बनकर बरसने लगी और पल भर में पूरा कमरा जलमग्न हो गया सिगरेट मिश्रित कसैले पानी से और वह उसके ऊपर तैरता हुआ बेहरकत..............................बहते हुए एक छोटे से दरवाज़े से बाहर निकल गया, कमरा जस का तस, सिगरेट और ऐश ट्रे सब गायब, रूह जा चुकी थी, रौशनी ने वहां अनेकों धमाके किये थे और हर कोना सफ़ेद होकर नहा गया था,सीलन ख़त्म हो गयी थी और खिडकियों से लगे परदे बहती हवा से लहरा कर उड़ रहे थे, सब कुछ दिव्य और एक कोने पर गमले में परिजात खिला हुआ था।

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