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रविवार, 29 सितंबर 2013

...........पढ़ना था मुझे :)


पढ़ना था मुझे पर पढ़ न पाई,
सपनों को अपने सच कर ना पाई;
रह गए अधूरे हर अरमान मेरे,
बदनसीबी की लकीर मेरे माथे पे छाई |

खेलने की उम्र में कमाना है पड़ा, 
झाड़ू-पोंछा हाथों से लगाना है पड़ा; 
घर-बाहर कर काम हुआ है गुज़ारा, 
इच्छाओं को अपनी खुद जलाना है पड़ा | 

एक अनाथ ने कब कभी नसीब है पाया, 
किताबों की जगह हाथों झाड़ू है आया; 
सरकारी वादे तो दफ्तरों तक हैं बस, 
कष्टों में भी अब मुसकुराना है आया | 

नियति मेरी यूं ही दर-दर है भटकना, 
झाड़ू-पोंछा, बर्तन अब मजबूरी है करना; 
हालात मेरे शायद न सुधरने हैं वाले, 
अच्छे रहन-सहन और किताबों को तरसना !

मेरा काव्य पिटारा ब्लॉग से ई. प्रदीप कुमार साहनी जी की एक बेहतरीन रचना आज सभी के साथ साँझा कर रहा हूँ...........उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

-- संजय भास्कर 


मंगलवार, 24 सितंबर 2013

सयानी सास और नई-नई बहू.....

एक सयानी सास ने नई-नई आई बहू से पूछा –
“बहू, मान लो अगर तुम पलंग पर बैठी हो और मैं
भी उस पर आकर बैठ जाऊं तो तुम
क्या करोगी ?”
बहू – “तो मैं उठकर सोफे पर बैठ जाऊंगी.”
सास – “और अगर मैं भी आकर सोफे पर बैठ
जाऊं तो क्या करोगी ?”
बहू – “तो मैं फर्श पर चटाई बिछाकर बैठ
जाऊंगी.”
सास – “और अगर मैं भी चटाई पर आ जाऊं
तो फिर क्या करोगी ?”
बहू – “तो मैं जमीन पर बैठ जाऊंगी.”
सास मजे लेते हुए आगे बोली – “और मैं जमीन
पर भी तुम्हारे बगल में बैठ गई
तो क्या करोगी ?”
बहू (खीझ कर ) – “तो मैं जमीन में गड्ढा खोद
कर उसमें बैठ जाऊंगी.”
सास – “और अगर मैं गड्ढे में भी आकर बैठ गई
तो ?”
बहू – “तो मैं ऊपर से मिट्टी डालकर
सिलसिला खत्म कर दूँगी … !!!” 



 अभी अभी एक मित्र ने पढ़ाया तो विचार आया की आप तक भी पहुंचा दूं!

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

शनिवार, 21 सितंबर 2013

..... वह किस्सा पुराना आज याद आया :))

आज याद आया
 वह किस्सा पुराना
जो ले गया उस मैदान में
जहां बिताई कई शामें
 गिल्ली डंडा खेलने में
कभी मां ने समझाया
कभी डाटा धमकाया
पर कारण नहीं बताया |
मैंने सोचा क्यूँ न खेलूँ
अकारण हर बात क्यूँ मानू ?
इसी जिद ने थप्पड़ से
स्वागत भी करवाया
रोना धोना काम न आया
माँ का कहना
वी .टो. पावर हुआ
वहाँ जाना बंद हो गया 
घर में कैरम  शुरू हुआ
आज सोचती हूँ
 कारण क्या रहा होगा
जाने कब सयानी हुई
मुझे याद नहीं |
 
आकांशा ब्लॉग से आशा सक्सेना जी की एक बेहतरीन रचना आज सभी के साथ साँझा कर रहा हूँ...........उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

-- संजय भास्कर 

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

........कील :)

कारीगर ने
कील का सही उपयोग किया
लकड़ी के टुकड़ों को जोड़ कर
एक टेबल बना दिया //

कील ने भी
नहीं बिगड़ने दी उसका स्वरुप
दर्द सहकर भी //

दूसरी तरफ
एक नासमझ ने
कील को फेक दिया सड़कों पर
इस बार कील ने
स्वम दर्द नहीं सहा
बल्कि ...
कितनो को घायल कर गया //


21वी सदी का इन्द्रधनुष ब्लॉग से बबन पांडये जी की एक बेहतरीन रचना आज सभी के साथ साँझा कर रहा हूँ.....उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

@ संजय भास्कर 


रविवार, 15 सितंबर 2013

.... इसलिए अब हम नए दोस्त नही बनाते :)

 
करके दोस्ती हम दोस्तों को नही भूलाते ,
जिंदगी भर हम दोस्ती है निभाते
ना तुम्हे हो बटवारे का एहसास ,
इसलिए अब हम नए दोस्त नही बनाते  !!
 
@ संजय भास्कर 
 
 

रविवार, 8 सितंबर 2013

तुमने कुछ कहा था....

तुमने कुछ कहा था?
शायद मैंने ही नहीं सुना होगा,
वक़्त के साथ - साथ थोडा बदल सा गया हूँ मैं,
तुम्हे नहीं लगता क्या ऐसा?
चलो अच्छा है फिर,
कम से कम ठंढी हो चुकी कॉफ़ी के साथ,
सिगरेट फूंकता हुआ मैं तुम्हे अभी भी अच्छा लगता हूँ,
देखो न, इन पके बालों और चहरे पर उभरती झुर्रियों में,
कितना वक़्त गुजर गया,
बस भागे जा रहे हैं हम,
मैं ठहरना चाहता हूँ,
लेकिन तुम ठहरने ही नहीं देती,
हम जैसे कल थे वैसे ही आज भी हैं,
समय से भागते हुए,
लेकिन तनहाई फिर भी नहीं मिली,
तुम्हे मिली क्या?
जिस दिन भी मिले बताना जरूर,
अपनी तन्हाई से मैं चुपके से पूछ लूँगा,
क्यूँ होता है इतना कुछ,
जब कुछ भी नहीं होना होता ?

-नीरज

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

............. अपना देश :)


ये ज़मी ये आसमा  
छोड़ कर इसे कहाँ जाऊ 
बसी है इस मिट्टी की खुशबू
मेरी सासों में
इस खुशबू को खुद से
कहाँ छुपाऊ ||
मेरा देश तो मेरा है
इसे छोड़ के
घर कहाँ बसाऊ
मकान तो कहीं भी बना लूँगा
पर समां सकूँ अपने देश को इसके अन्दर
इतनी जगह मै कैसे लाऊ||
मुझे बताओ
की एक मकान को
अपना मुकाम मै  कैसे बनाऊ
मेरा दिल तो हिंदी है
इसे कोई और भाषा कैसे समझाऊ
कुछ बाते तो मुझे हिंदी में ही अच्छी लगती है
भला हर बातो का अंग्रेजी अनुबाद कैसे बनाऊ ||


राहुल का तबेला ब्लॉग से राहुल जी की एक बेहतरीन रचना आज सभी के साथ साँझा कर रहा हूँ.....उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

@ संजय भास्कर 


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