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सोमवार, 22 जुलाई 2013

कुछ पुरानी यादें -- आदमी मुसाफिर है आता है जाता है :)


इस सुंदर गीत के साथ .....आज कुछ पुरानी यादें ताजा हो जाए
फ़िल्म -अपनापन 



@ संजय भास्कर  

गुरुवार, 18 जुलाई 2013

........ बेटियां :)



आंगन में महकती खुशबू कि तरह
श्रद्धा में वो तुलसी कि तरह 
हसती मुस्कुराती गुडिया कि तरह 
बेटीया तो है सुंदर परियो कि तरह |

छोटी सी मुस्कान लेकर आती है 
नन्हे कदमो से जब वो इठलाती है 
तुत्लाकार जब वो कुछ कहती है
घर में खुशहाली छां जाती है |

छोटी सी बीटीया जब बडी हो जाती है 
बिदाई कि घडी माता - पिता को तड्पाती है |

भिगी आंखो में वो पुरानी यादे आ जाती है 
नन्ही  बीटीया के कदमो कि आहट सुना जाती है 
लब पर दुआये दिल में फरियाद है 
मेरी बीटीया का जीवन सदा आबाद रहे.......!!!


मेरा मन पंछी सा ब्लॉग से रीना मोर्य जी की एक बेहतरीन रचना आपके साथ साँझा कर रहा हूँ.....उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

@ संजय भास्कर 

सोमवार, 8 जुलाई 2013

दिल के टुकड़े-टुकड़े थे


वो खुद में इतना सिमटे-सिमटे थे
जैसे वो दिल को पकड़े-पकड़े थे |

उनको देख हुए थे बेसुध हम तो
क्या बात करें अब मुखड़े, मुखड़े थे |

ना तीर चला , ना ही तलवार चली
देखा तो दिल के टुकड़े-टुकड़े थे |

जाने किसका जादू चढ़ बैठा था
बेसुध थे सब, सब उखड़े-उखड़े थे |

दिल ने आखिर दिल लूट लिया होगा 
उनके गेसू भी उलझे-उलझे थे |

-------- दिलबाग विर्क

( : एक बार फिर -- रमाकांत जी



कलयुग में उतावला
धर्मयुद्ध को अभिमन्यु
निहत्था।
समक्ष महारथियों के
युद्ध और विजय
नहीं।
मृत्यु नियति है
तब निरर्थक वीरता का प्रदर्शन
कुरुक्षे़त्र में ही क्यों
न्याय-अन्याय
धर्म-अधर्म
स्वजन का वध
जब सब नियत
एक बार फिर.....





छले गए हर युग में
कर्ण और एकलव्य
कुन्ती और द्रोण से
तार-तार द्रौपदी ही
और चक्षुहीन पितामह
कृष्ण
कर्म का संदेश ले
खुली आंखों से
सत्य का आग्रही बन
सृष्टि के मूल
विषमता को छलते
स्वयं के बुने तानों में
उलझते कसते गए
घटोत्कच पुत्र बर्बरीक का शीश मांग
युद्ध की विभीषिका देखने
एक बार फिर.....

सजेगा भीष्‍म
शर की शैया पर
संधान किया अर्जुन ने
शिखण्डी की आड़ से
गर्भ में आहत
परीक्षित पांचजन्य से
निर्विकार पांचाली
महायुद्ध के तांडव में
ध्वज पर पवन पुत्र
साक्ष्य बन बैठे
दुर्योधन के हृदय
और अंबर पर
अबाध सूर्य की प्रचण्डता
एक बार फिर.....

बंद होते गए द्वार
न्याय की प्रतीक्षा में
सत्य की खोज में
लोक कल्याण के
नपुंसक बनने से।
और हम सब
भ्रम में निरंतर
पानी पर लकीर खीचते
श्रमसाध्य बने
पीढी दर पीढी
अंधों से बदतर
एक बार फिर....... !!


जरूरत ब्लॉग से रमाकांत जी की एक बेहतरीन रचना आपके साथ साँझा कर रहा हूँ....उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

@ संजय
भास्कर 

सोमवार, 1 जुलाई 2013

सिंपल





तेज होती सांसें,
और आँखों में नमी,
ह्रदय की धक् धक्,
और बस यहीं ख़तम हो जाती है मेरी प्रेम कहानी,
बारिश में भीगते हुए एक सुनसान सड़क को निहारना,
कभी कभी अच्छा नहीं लगता क्या?
या चिलचिलाती धुप में एक पगडण्डी,
और दूर तक, मीलों तक,
न कोई छांव और न ही कोई मानुष,
कभी कभी वह भी सुकून नहीं देता क्या?
कलकत्ता की बरसती हुई दोपहरी में,
खिड़की के पास खड़े होकर,
सिगरेट पीते हुए टैगोर को पढना भी,
बहुत राहत देता है,
या फिर ट्राम में बैठे हुए मैदान * को देखते हुए गुजर जाना ,
अजीब सा है न सब कुछ,
लेकिन क्या सारे प्रश्न सचमुच इतने सिंपल होते हैं,
की आसानी से उनको समझा जा सके,
अगर इतना आसान होता,
तो शायद ..............................
शायद मैं कुछ और सोच रहा होता……

तारों को निहार रहा होता,
या फिर चलती हुई ट्रेन से दौड़ते हुए चाँद को चिढ़ा रहा होता,
उफ़्फ़…काश कुछ भी सिंपल होता मेरी लाइफ में,
कुछ भी,
पर जैसा भी है,
मुझे पसंद है,
ठीक तुम्हारी तरह।

-नीरज

* मैदान कोलकाता में है.
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