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रविवार, 30 जून 2013

दो राहे ...:)

क्यू असमंजस में पड़ जाता हूँ
हर मोड़ पर दो राहें पाता हूँ.
किस राह को पकडू ओर किस राह को छोड़ू
कैसे इस गहरी सोच को तोड़ू

बदते कदमो के साथ
क्यू कुछ पीछे छूट जाने का होता हें एहसास
दोनो राहें ले जाती किसी डगर की ओर
बस एक की हें मंज़िल ओर एक का हें ना कोई छोर


क्या किया क्यू किया इस कशमकश में
छिड़ जाती दिल ओर दिमाग़ की तार
बस इन्ही दो राहो ने समेट रखा हें ज़िंदगी का सार!!


कुछ दिल से ब्लॉग से पूजा जी की एक बेहतरीन रचना आपके साथ साँझा कर रहा हूँ.....उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

@ संजय भास्कर 

4 टिप्‍पणियां:

  1. केवल आप ही नहीं हम सभी अपने आपको दो राहों पर पाते है
    latest post झुमझुम कर तू बरस जा बादल।।(बाल कविता )

    उत्तर देंहटाएं
  2. बस एक की हें मंज़िल ओर एक का हें ना कोई छोर

    ...जब यह पता है तो फिर द्वंद्व कैसा!

    उत्तर देंहटाएं
  3. छिड़ जाती दिल ओर दिमाग़ की तार
    बस इन्ही दो राहो ने समेट रखा हें ज़िंदगी का सार!!
    ...वाह: बहुत खूब,,,, पूजा जी बहुत सुन्दर अहसास.,,,,,.

    उत्तर देंहटाएं

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