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रविवार, 30 जून 2013

दो राहे ...:)

क्यू असमंजस में पड़ जाता हूँ
हर मोड़ पर दो राहें पाता हूँ.
किस राह को पकडू ओर किस राह को छोड़ू
कैसे इस गहरी सोच को तोड़ू

बदते कदमो के साथ
क्यू कुछ पीछे छूट जाने का होता हें एहसास
दोनो राहें ले जाती किसी डगर की ओर
बस एक की हें मंज़िल ओर एक का हें ना कोई छोर


क्या किया क्यू किया इस कशमकश में
छिड़ जाती दिल ओर दिमाग़ की तार
बस इन्ही दो राहो ने समेट रखा हें ज़िंदगी का सार!!


कुछ दिल से ब्लॉग से पूजा जी की एक बेहतरीन रचना आपके साथ साँझा कर रहा हूँ.....उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

@ संजय भास्कर 

बुधवार, 26 जून 2013

आत्म संतोष -- आशा जी



पहले भी रहे असंतुष्ट
आज भी वही हो
पहले थे अभाव ग्रस्त
पर आज सभी सुविधाएं
 कदम चूमती तुम्हारे
फिर प्रसन्नता से परहेज क्यूं ?
कारण जानना चाहा भी
 पर कोइ सुराग न मिल पाया
परन्तु मैंने ठान लिया
कारण खोजने के लिए
तुम्हें टटोलने के लिए |

जानते  हो तुम भी
सभी इच्छाएं पूर्ण नहीं होतीं
समझोते भी करने होते हैं
परिस्थितियों से ,
 यह भी तभी होता संभव
जब स्वभाव लचीला हो
समय के साथ परिपक्व हो
कुंठा ग्रस्त न हो  |
चाहे जब खुश हो जाना
अनायास गुस्सा आना
 उदासी का आवरण ओढ़े
अपने आप में सिमिट जाना |
कुछ तो कारण होगा
जो बार बार सालता होगा
वही अशांति का कारण होगा
जो चाहा कर न पाए
कारण चाहे जो भी हो |
क्या सब को
 सब कुछ मिल पाता है ?
जो मिल गया उसे ही
अपनी उपलब्धि मान
भाग्य को सराहते यदि
 आत्मसंतुष्टि का धन पाते |
सभी पूर्वनिर्धारित  है
भाग्य से ज्यादा कुछ न मिलता
जान कर भी हो अनजान क्यूँ ?
हंसी खुशी जीने की कला
बहुत महत्त्व रखती है
 कुछ अंश भी यदि अपनाया
जर्रे जर्रे में दिखेगी
खुशियों की छाया
फिर उदासी तुम्हें छू न पाएगी
सफलता सर्वत्र  होगी |
आशा

आशा जी एक पुरानी बेहतरीन रचना आपके साथ साँझा कर रहा हूँ...उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !


@ संजय भास्कर

सोमवार, 17 जून 2013

एक कदम तू चल तो सही -- आनन्द मेहरा



" तू चल तो सही अपने कदम,

हर हालत में कही न कही पहुच ही जायेगा.

बैठा रहेगा एक जगह पर तो,

वही पर रह जायेगा.

कदम छोटे ही भले ही चल,

मगर कदमो को रुकने मत दे,

नदी की तरह खुद अपने रास्ते बना लेगा.

कदमो को गर जरुरत पड़े तो थोडा विश्राम दे,

मगर एक जगह पर टिक अपने मंजिल से अपने को दूर मत कर.

चल चला चल कदमो से अपने कितनो के लिए रास्ते बनाता चल......!!!!


कारवां जारी है ब्लॉग से आनन्द मेहरा जी की एक बेहतरीन रचना आपके साथ साँझा कर रहा हूँ .....उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !


@ संजय भास्कर  

मंगलवार, 4 जून 2013

"तुम्हारा होना और ना होना"

धूप रोज़ की तरह आज भी बहुत तेज है,
सिगरेट पीते हुए,
रोज़ की ही तरह आज भी गरियाया धूप को,
सब कुछ वैसा ही है,
जैसे रोज़ हुआ करता है,
सुबह उठना, तैयार होना,
और चल देना रोज़ की भागमभाग में,
दौड़ते हुए, जैसे कहीं कुछ बदला ही नहीं,
तुम्हारा होना न होना न जाने क्यूँ नहीं खलता,
सुबह की पहली किरण आज भी माथा चूमती है,
जैसे पहले चूमा करती थी,
लेकिन तुलसी, उसका क्या करूँ,
वह खामोश हो गयी है,
उसके पत्ते झरने लगे हैं,
और छत वाला गेंदा कब का सूख गया,
कोनें में रखा तुम्हारा टेडी(पोनी) अब मुझे देख कर नहीं डरता,
खुलेआम आँखों में आँखें डाल देता है,
और मैं कुछ नहीं कर पाता,
तुम्हारी तस्वीर पर नज़र पड़ते ही हटा लेना चाहता हूँ,
लेकिन वह तुमसे हटती ही नहीं,
ऑफिस की कुर्सी खाली सी दिखती है,
और ऐसा लगता है जैसे अभी तुम आ जाओगी,
और पूछोगी कई सारे अनसुलझे सवाल,
जिनमे से कितनों का जवाब मेरे पास नहीं होगा,
अब महसूस होता है कि कितना कुछ बदल गया है,
साप्ताहांत अब जल्दी नहीं ख़तम होता,
कितना अंतर है तम्हारे होने और ना होने में,
एक धुएं का गुबार या फिर घना कुहासा,
तुमसे ही पूछ रहा हूँ, बताती क्यूँ नहीं?

-नीरज
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