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शुक्रवार, 31 मई 2013

पथरीली राहें --- श्याम कोरी 'उदय'

मूंड खुजाते बैठ गया था
देख सफ़र की, पथरीली राहें
दरख़्त तले की शीतल छाया
लग रही थी, तपती मुझको !

फिर, चलना था, और
आगे बढ़ना था मुझको
राहें हों पथरीली
या तपती धरती हो
मेरी मंजल तक तो, चलना था मुझको !

कुछ पल सहमा, सहम रहा था
देख सुलगती, पथरीली राहें
फिर हौसले को, मैंने
सोते, सोते से झंकझोर जगाया !

पानी के छींटे, मारे माथे पर अपने
कदम उठाये, रखे धरा पर
पकड़ हौसला, और कदमों को
धीरे धीरे, चल पडा मैं !

पथरीली, तपती, सुलगती राहों पर
कदम, हौसले, धीरे धीरे
संग संग मेरे चल रहे थे
जीवन, और मंजिल की ओर !!
 
कडुवा सच ब्लॉग से श्याम कोरी जी की एक बेहतरीन रचना आपके साथ साँझा कर रहा हूँ .....उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

@ संजय भास्कर 

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