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सोमवार, 29 अप्रैल 2013

एक मुलाकात -- डॉ निशा महाराणा


सुबह का समय था
दिवाकर सात घोडों के रथ पे
होके सवार
अपनी प्रिया से मिलकर
आ रहा था
पवन हौले-हौले पेड की डालियों औ
पत्तों को प्यार से सहला रहा था
समाँ मनभावन था अचानक-
मेरी आँखें उसकी आँखों से मिली
उसने मुझको देखा
मैनें उसको देखा
मैं आगे बढी
उसने पीछे से  मारा झपट्टा
औ पकड लिया मेरा दुपट्टा
मैं पीछे मुडी उसे डाँटा
वो भागा पर-------
पुनः आगे आकर
मेरे रास्ते को रोका
औ मेरी आँखों में झाँका
उसकी आँखों में झाँकते हुये
महसुस हुआ
उसका प्यार बडा ही सच्चा था क्योंकि वो---------
आदमी नहीं बंदर का बच्चा था !!

My Expression ब्लॉग से डॉ निशा महाराणा जी की एक बेहतरीन रचना आपके साथ साँझा कर रहा हूँ .....उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

@ संजय भास्कर


बुधवार, 24 अप्रैल 2013

दिन में फैली ख़ामोशी -- संजय भास्कर


जब कोई इस दुनिया से
चला जाता है
वह दिन उस इलाके के लिए
बहुत अजीब हो जाता है
चारों दिशओं में जैसे
एक ख़ामोशी सी छा जाती है
दिन में फैली ख़ामोशी
वहां के लोगो को सुन्न कर देती है
क्योंकि कोई शक्श
इस दुनिया से
रुखसत हो चुका होता है ...........!!!!!

 
चित्र - गूगल से साभार

 
@ संजय भास्कर 

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

न धूर्त बनें, न मूर्ख कहलाएं

कई बार ऐसा होता है कि कुछ लोग उतने अच्छे नहीं होते जितने समझे जाते हैं और कई बार इसके उल्ट भी होता है कोई व्यक्ति विशेष उतना बुरा नहीं होता , जितना वो समझा जाता है । यदि किसी की छवि नकारात्मक है तो जरूरत है सोचने की । कहते हैं धुआँ वहीं उठता है यहाँ आग होती है । जरूर उस व्यक्ति विशेष के कुछ कृत्य ऐसे रहे होंगे जिन्होंने उसे बुरे के रूप में प्रचारित किया होगा । फिर यह धारणा मजबूत होती जाती है और अच्छाइयां बुराई के स्याह पर्दे में आलोप हो जाती हैं । 
               " हमने लोगों से क्या लेना है ", " लोगों का तो काम ही नुक्ताचीनी करना है " - ऐसी धारणाएं , ऐसी जीवनशैली छवि को और बिगाडती है । सामाजिक प्राणी के नाते लोग आपके बारे में क्या सोचते हैं , क्या कहते हैं यह काफी महत्वपूर्ण है । यह ठीक है कि हमें अपने ढंग से जीने का पूर्ण अधिकार है लेकिन इतना आत्ममंथन तो हमें करना ही चाहिए कि अगर हम बुरे के रूप में कुख्यात हैं तो क्यों ? ऐसा सोचने के बाद ही यह प्रश्न आयेगा कि कैसे इस छवि को सुधारा जा सकता है । 
               यह सच है कि अच्छा दिखना उतना महत्वपूर्ण नहीं , जितना कि अच्छा होना और इस नकाबपोश दुनिया में ऐसा भी होता है कि अच्छे दिखने वाले अच्छे होते नहीं , लेकिन आपका अच्छा होना भी तब बेकार हो जाता है जब आप अच्छे दिखते नहीं । अगर आपकी कोई एक बुराई सबको दिखने लग गई तो आपकी सौ अच्छाइयां भी उसमें छुप जाएंगी । 
                         सिर्फ अच्छा दिखना और वास्तव में अच्छा न होना यहाँ धूर्तता है, वहीं अच्छा होना और बुरा दिखना मूर्खता । और अगर हम चाहते हैं कि हम न धूर्त बनें और  न मूर्ख कहलाएं तो हमें अच्छा बनने के साथ अच्छा दिखने का भी प्रयास करना होगा । 


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