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बुधवार, 2 जनवरी 2013

इतनी मजबूर तो नहीं ज़िन्दगी!...(कुँवर जी)

क्यूँ घुट रहे हो पल-पल,
कोई क़सूर तो नही जिंदगी!
खोलो पलके हाथ बढाओ,
इतनी भी दूर तो नहीं ज़िन्दगी!
माना ज़ख्म है कई तो क्या,
कोई नासूर तो नहीं ज़िन्दगी!
रोते हुए को हँसी ना दे पाए जो,
इतनी मजबूर तो नहीं ज़िन्दगी!
कुँवर जी,

4 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर रचना
    आपकी इस पोस्ट के चर्चे 3-1-2013 के चर्चा मंच पर भी हैं

    उत्तर देंहटाएं
  2. रोते हुए को हँसी ना दे पाए जो,
    इतनी मजबूर तो नहीं जिंदगी
    ..........एक सच जिसे बिल्‍कुल सटीक शब्‍द दिये हैं आपने ... बहुत ही बढिया प्रस्‍तुति... आपको २०१३ की मंगल कामनाएं .....आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सही कहा, शुभकामनाएं.

    रामराम

    उत्तर देंहटाएं

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