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शनिवार, 23 नवंबर 2013

खाक के धुएं यादों से लिपट कर रोज़ रोते हैं।



कुछ शब्द रह गए थे दरिया किनारे,
कुछ यादें अब भी बाबस्ता देखा करती हैं,
तेरा रास्ता,
और उग आता है दूबों का जंगल,
निर्जनता के झींगुरों की आवाज़ में,
अब भी यादें बिखरी पड़ी हैं,
जो रातरानी बनकर खनक पड़ती हैं,
रातों में,
और मैं रात भर,
देखा करता हूँ,
वह पतली सी लीख,
जिसके सहारे तुम चली गयी थी,
कभी न लौटने के लिए,
लेकिन कहाँ से लाऊं मैं वह मन,
जो रोक सके आँखों को जगने से,
और न देखे तुम्हारे सपने,
ना सुने तुम्हारी आहट,
और निकाल कर फेंक दे तुम्हारी सारी यादें,
और एक चिता बनाकर जला सके तुमको, तुम्हारी यादों को,
ख़ाक में बदलने के लिए,
लेकिन सुना है,
"खाक के धुएं यादों से लिपट कर रोज़ रोते हैं।"

- नीरज  

बुधवार, 13 नवंबर 2013

.............. .....साँवली बिटिया -- रीना मौर्या

रंग सांवला बिटिया का 
कैसे ब्याह रचाऊँगा 
बेटे जो होते सांवले...
शिव और कृष्णा उन्हें बनाता 
बेटी को क्या उपमा दिलाऊंगा ....

पढ़ी लिखी संस्कारी है वो
गुणों से सुसज्जित न्यारी है वो
मेरी तो राजदुलारी है वो
पर अपने रंग से थोड़ा सा लजाई है वो .......

गोरा तो गोरी ही चाहे
काले को भी गोरी ही मनभाए
सांवल किसी को क्यूँ ना सुहाए
प्रेम का रंग क्यूँ कोई देख ना पाए ......

वो भी सृजन है देवों का
करुणा , ममता उसमे भी है
घर की लक्ष्मी भी बन दिखाएगी वो
ग़र समझो उसे की वो अपनी है....

सांवली है पर संध्या है वो..
भोर की पहली सांवली बदरिया है वो
मेरी तो राजदुलारी है वो
सांवल है तो क्या??
बिटिया बड़ी ही प्यारी है वो......

पढ़ी लिखी संस्कारी है वो
गुणों से सुसज्जित न्यारी है वो.... !!!


रीना मौर्या जी की एक बेहतरीन रचना आज सभी के साथ साँझा कर रहा हूँ...........उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

-- संजय भास्कर


गुरुवार, 24 अक्तूबर 2013

मन के मुताबिक चलने से -- सदा जी

आराम से
थकने के बारे में
सोचा है कभी
इससे भी थक जाता है मन
हर चीज से थकान का अनुभव होता है
नहीं थकते हैं हम सिर्फ
मन के मुताबिक चलने से .....!!!

कभी खुश रहने की
अभिलाषा पूरी नहीं होती
खुशी हमेशा जाने क्‍यूं
दूर ही रहती है
कभी पा लेना
इच्छित वस्‍तु
खुशी को पाना क्षणभंगुर सा
अगले ही पल
बढ़ जाती है खुशी
दूसरे पड़ाव पर
वह नित नये
ठिकाने बदलती रहती ह‍ै
और हम
उसकी तलाश में हो लेते हैं ...!!! 


--  जी की एक बेहतरीन रचना 



सोमवार, 14 अक्तूबर 2013

........है जिंदगी एक छलावा -- श्रीमती आशा लता सक्सेना जी :)



है जिंदगी एक छलावा
पल पल रंग बदलती है
है जटिल स्वप्न सी
कभी स्थिर नहीं रहती |
जीवन से सीख बहुत पाई
कई बार मात भी खाई
यहाँ अग्नि परीक्षा भी
कोई यश न दे पाई |
अस्थिरता के इस जालक में
फँसता गया ,धँसता गया
असफलता ही हाथ लगी
कभी उबर नहीं पाया |
रंग बदलती यह जिंदगी
मुझे रास नहीं आती
जो सोचा कभी न हुआ
स्वप्न बन कर रह गया |
छलावा ही छलावा
सभी ओर नज़र आया
इससे कैसे बच पाऊँ
विकल्प नज़र नहीं आया  !!

--  आशा लता सक्सेना 


शुक्रवार, 4 अक्तूबर 2013

........क्या गुनाह किया :))


ज़माने ने रुलाया है हमको ,
एक अपने ने रुला दिया तो क्या गुनाह किया !!


-- संजय भास्कर  


बुधवार, 2 अक्तूबर 2013

ग़ालिब ये इश्क नहीं आसां.......

सीलन से भरे उस कमरे में अँधेरा भरा हुआ था, रोशनी का एक छोटा सा भी टुकड़ा आने की जगह नहीं थी वहां, एक कोने में एक ऐश ट्रे और सिगरेट के कईयों टुकड़े बिखरे पड़े थे, एक जलती हुई सिगरेट अभी भी ऐश ट्रे के मुह पर आग जला रही थी और धुएं की एक धार एक सरल रेखा में ऊपर जाती हुई बिखर जाती थी और फिर उसके टुकड़े तलाशना शुरू कर देता था वो, धुएं का एक टुकड़ा पकड़ते ही उसकी आँखें चमक उठती थी, लेकिन यह क्या, हाथ खोलते ही बिखर जाता था वह टुकड़ा फिर कई टुकड़ों में, और वह भौंचक होकर देखता और अपने बाल खुजाकर फिर से तन्मयता से लग जाता टुकड़े पकड़ने में, आखिर हारकर उसने सिगरेट पीनी शुरू कर दी और फूँक फूँक कर तोड़ डाले सारे टुकड़े, पूरा कमरा कसैले धुएं से भर गया, अब वह जोर जोर से सांसें लेकर भर रहा था वह कसैलापन अपने फेंफडों में, कभी कभी कडवापन मिठास से ज्यादा राहत देती है, फिर उसने अपनी आँखें बंद कर ली थी और धुएं के छल्ले रह रह कर मुह से निकल जाते थे, गोल गोल ऊपर जाते बिखरते हुए, महीन हवा की चादर पर अपनी छाप छोड़ते हुए अनमने से छल्ले, ज़िन्दगी के छल्ले, हारे हुए छल्ले, टूटते हुए छल्ले, जीवन भी तो कुछ ऐसा ही है, छल्ले बनता हुआ, बड़ा होता हुआ अंततः टूट जाने के लिए, उसकी आँखों से एक आंसूं चुपके से ढलका और पूरा कमरा पानी पानी हो गया, सीलन की बूँदें पानी का अंगार बनकर बरसने लगी और पल भर में पूरा कमरा जलमग्न हो गया सिगरेट मिश्रित कसैले पानी से और वह उसके ऊपर तैरता हुआ बेहरकत..............................बहते हुए एक छोटे से दरवाज़े से बाहर निकल गया, कमरा जस का तस, सिगरेट और ऐश ट्रे सब गायब, रूह जा चुकी थी, रौशनी ने वहां अनेकों धमाके किये थे और हर कोना सफ़ेद होकर नहा गया था,सीलन ख़त्म हो गयी थी और खिडकियों से लगे परदे बहती हवा से लहरा कर उड़ रहे थे, सब कुछ दिव्य और एक कोने पर गमले में परिजात खिला हुआ था।

पूरा पढने के लिए यहाँ क्लिक करें।

रविवार, 29 सितंबर 2013

...........पढ़ना था मुझे :)


पढ़ना था मुझे पर पढ़ न पाई,
सपनों को अपने सच कर ना पाई;
रह गए अधूरे हर अरमान मेरे,
बदनसीबी की लकीर मेरे माथे पे छाई |

खेलने की उम्र में कमाना है पड़ा, 
झाड़ू-पोंछा हाथों से लगाना है पड़ा; 
घर-बाहर कर काम हुआ है गुज़ारा, 
इच्छाओं को अपनी खुद जलाना है पड़ा | 

एक अनाथ ने कब कभी नसीब है पाया, 
किताबों की जगह हाथों झाड़ू है आया; 
सरकारी वादे तो दफ्तरों तक हैं बस, 
कष्टों में भी अब मुसकुराना है आया | 

नियति मेरी यूं ही दर-दर है भटकना, 
झाड़ू-पोंछा, बर्तन अब मजबूरी है करना; 
हालात मेरे शायद न सुधरने हैं वाले, 
अच्छे रहन-सहन और किताबों को तरसना !

मेरा काव्य पिटारा ब्लॉग से ई. प्रदीप कुमार साहनी जी की एक बेहतरीन रचना आज सभी के साथ साँझा कर रहा हूँ...........उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

-- संजय भास्कर 


मंगलवार, 24 सितंबर 2013

सयानी सास और नई-नई बहू.....

एक सयानी सास ने नई-नई आई बहू से पूछा –
“बहू, मान लो अगर तुम पलंग पर बैठी हो और मैं
भी उस पर आकर बैठ जाऊं तो तुम
क्या करोगी ?”
बहू – “तो मैं उठकर सोफे पर बैठ जाऊंगी.”
सास – “और अगर मैं भी आकर सोफे पर बैठ
जाऊं तो क्या करोगी ?”
बहू – “तो मैं फर्श पर चटाई बिछाकर बैठ
जाऊंगी.”
सास – “और अगर मैं भी चटाई पर आ जाऊं
तो फिर क्या करोगी ?”
बहू – “तो मैं जमीन पर बैठ जाऊंगी.”
सास मजे लेते हुए आगे बोली – “और मैं जमीन
पर भी तुम्हारे बगल में बैठ गई
तो क्या करोगी ?”
बहू (खीझ कर ) – “तो मैं जमीन में गड्ढा खोद
कर उसमें बैठ जाऊंगी.”
सास – “और अगर मैं गड्ढे में भी आकर बैठ गई
तो ?”
बहू – “तो मैं ऊपर से मिट्टी डालकर
सिलसिला खत्म कर दूँगी … !!!” 



 अभी अभी एक मित्र ने पढ़ाया तो विचार आया की आप तक भी पहुंचा दूं!

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

शनिवार, 21 सितंबर 2013

..... वह किस्सा पुराना आज याद आया :))

आज याद आया
 वह किस्सा पुराना
जो ले गया उस मैदान में
जहां बिताई कई शामें
 गिल्ली डंडा खेलने में
कभी मां ने समझाया
कभी डाटा धमकाया
पर कारण नहीं बताया |
मैंने सोचा क्यूँ न खेलूँ
अकारण हर बात क्यूँ मानू ?
इसी जिद ने थप्पड़ से
स्वागत भी करवाया
रोना धोना काम न आया
माँ का कहना
वी .टो. पावर हुआ
वहाँ जाना बंद हो गया 
घर में कैरम  शुरू हुआ
आज सोचती हूँ
 कारण क्या रहा होगा
जाने कब सयानी हुई
मुझे याद नहीं |
 
आकांशा ब्लॉग से आशा सक्सेना जी की एक बेहतरीन रचना आज सभी के साथ साँझा कर रहा हूँ...........उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

-- संजय भास्कर 

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

........कील :)

कारीगर ने
कील का सही उपयोग किया
लकड़ी के टुकड़ों को जोड़ कर
एक टेबल बना दिया //

कील ने भी
नहीं बिगड़ने दी उसका स्वरुप
दर्द सहकर भी //

दूसरी तरफ
एक नासमझ ने
कील को फेक दिया सड़कों पर
इस बार कील ने
स्वम दर्द नहीं सहा
बल्कि ...
कितनो को घायल कर गया //


21वी सदी का इन्द्रधनुष ब्लॉग से बबन पांडये जी की एक बेहतरीन रचना आज सभी के साथ साँझा कर रहा हूँ.....उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

@ संजय भास्कर 


रविवार, 15 सितंबर 2013

.... इसलिए अब हम नए दोस्त नही बनाते :)

 
करके दोस्ती हम दोस्तों को नही भूलाते ,
जिंदगी भर हम दोस्ती है निभाते
ना तुम्हे हो बटवारे का एहसास ,
इसलिए अब हम नए दोस्त नही बनाते  !!
 
@ संजय भास्कर 
 
 

रविवार, 8 सितंबर 2013

तुमने कुछ कहा था....

तुमने कुछ कहा था?
शायद मैंने ही नहीं सुना होगा,
वक़्त के साथ - साथ थोडा बदल सा गया हूँ मैं,
तुम्हे नहीं लगता क्या ऐसा?
चलो अच्छा है फिर,
कम से कम ठंढी हो चुकी कॉफ़ी के साथ,
सिगरेट फूंकता हुआ मैं तुम्हे अभी भी अच्छा लगता हूँ,
देखो न, इन पके बालों और चहरे पर उभरती झुर्रियों में,
कितना वक़्त गुजर गया,
बस भागे जा रहे हैं हम,
मैं ठहरना चाहता हूँ,
लेकिन तुम ठहरने ही नहीं देती,
हम जैसे कल थे वैसे ही आज भी हैं,
समय से भागते हुए,
लेकिन तनहाई फिर भी नहीं मिली,
तुम्हे मिली क्या?
जिस दिन भी मिले बताना जरूर,
अपनी तन्हाई से मैं चुपके से पूछ लूँगा,
क्यूँ होता है इतना कुछ,
जब कुछ भी नहीं होना होता ?

-नीरज

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

............. अपना देश :)


ये ज़मी ये आसमा  
छोड़ कर इसे कहाँ जाऊ 
बसी है इस मिट्टी की खुशबू
मेरी सासों में
इस खुशबू को खुद से
कहाँ छुपाऊ ||
मेरा देश तो मेरा है
इसे छोड़ के
घर कहाँ बसाऊ
मकान तो कहीं भी बना लूँगा
पर समां सकूँ अपने देश को इसके अन्दर
इतनी जगह मै कैसे लाऊ||
मुझे बताओ
की एक मकान को
अपना मुकाम मै  कैसे बनाऊ
मेरा दिल तो हिंदी है
इसे कोई और भाषा कैसे समझाऊ
कुछ बाते तो मुझे हिंदी में ही अच्छी लगती है
भला हर बातो का अंग्रेजी अनुबाद कैसे बनाऊ ||


राहुल का तबेला ब्लॉग से राहुल जी की एक बेहतरीन रचना आज सभी के साथ साँझा कर रहा हूँ.....उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

@ संजय भास्कर 


सोमवार, 22 जुलाई 2013

कुछ पुरानी यादें -- आदमी मुसाफिर है आता है जाता है :)


इस सुंदर गीत के साथ .....आज कुछ पुरानी यादें ताजा हो जाए
फ़िल्म -अपनापन 



@ संजय भास्कर  

गुरुवार, 18 जुलाई 2013

........ बेटियां :)



आंगन में महकती खुशबू कि तरह
श्रद्धा में वो तुलसी कि तरह 
हसती मुस्कुराती गुडिया कि तरह 
बेटीया तो है सुंदर परियो कि तरह |

छोटी सी मुस्कान लेकर आती है 
नन्हे कदमो से जब वो इठलाती है 
तुत्लाकार जब वो कुछ कहती है
घर में खुशहाली छां जाती है |

छोटी सी बीटीया जब बडी हो जाती है 
बिदाई कि घडी माता - पिता को तड्पाती है |

भिगी आंखो में वो पुरानी यादे आ जाती है 
नन्ही  बीटीया के कदमो कि आहट सुना जाती है 
लब पर दुआये दिल में फरियाद है 
मेरी बीटीया का जीवन सदा आबाद रहे.......!!!


मेरा मन पंछी सा ब्लॉग से रीना मोर्य जी की एक बेहतरीन रचना आपके साथ साँझा कर रहा हूँ.....उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

@ संजय भास्कर 

सोमवार, 8 जुलाई 2013

दिल के टुकड़े-टुकड़े थे


वो खुद में इतना सिमटे-सिमटे थे
जैसे वो दिल को पकड़े-पकड़े थे |

उनको देख हुए थे बेसुध हम तो
क्या बात करें अब मुखड़े, मुखड़े थे |

ना तीर चला , ना ही तलवार चली
देखा तो दिल के टुकड़े-टुकड़े थे |

जाने किसका जादू चढ़ बैठा था
बेसुध थे सब, सब उखड़े-उखड़े थे |

दिल ने आखिर दिल लूट लिया होगा 
उनके गेसू भी उलझे-उलझे थे |

-------- दिलबाग विर्क

( : एक बार फिर -- रमाकांत जी



कलयुग में उतावला
धर्मयुद्ध को अभिमन्यु
निहत्था।
समक्ष महारथियों के
युद्ध और विजय
नहीं।
मृत्यु नियति है
तब निरर्थक वीरता का प्रदर्शन
कुरुक्षे़त्र में ही क्यों
न्याय-अन्याय
धर्म-अधर्म
स्वजन का वध
जब सब नियत
एक बार फिर.....





छले गए हर युग में
कर्ण और एकलव्य
कुन्ती और द्रोण से
तार-तार द्रौपदी ही
और चक्षुहीन पितामह
कृष्ण
कर्म का संदेश ले
खुली आंखों से
सत्य का आग्रही बन
सृष्टि के मूल
विषमता को छलते
स्वयं के बुने तानों में
उलझते कसते गए
घटोत्कच पुत्र बर्बरीक का शीश मांग
युद्ध की विभीषिका देखने
एक बार फिर.....

सजेगा भीष्‍म
शर की शैया पर
संधान किया अर्जुन ने
शिखण्डी की आड़ से
गर्भ में आहत
परीक्षित पांचजन्य से
निर्विकार पांचाली
महायुद्ध के तांडव में
ध्वज पर पवन पुत्र
साक्ष्य बन बैठे
दुर्योधन के हृदय
और अंबर पर
अबाध सूर्य की प्रचण्डता
एक बार फिर.....

बंद होते गए द्वार
न्याय की प्रतीक्षा में
सत्य की खोज में
लोक कल्याण के
नपुंसक बनने से।
और हम सब
भ्रम में निरंतर
पानी पर लकीर खीचते
श्रमसाध्य बने
पीढी दर पीढी
अंधों से बदतर
एक बार फिर....... !!


जरूरत ब्लॉग से रमाकांत जी की एक बेहतरीन रचना आपके साथ साँझा कर रहा हूँ....उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

@ संजय
भास्कर 

सोमवार, 1 जुलाई 2013

सिंपल





तेज होती सांसें,
और आँखों में नमी,
ह्रदय की धक् धक्,
और बस यहीं ख़तम हो जाती है मेरी प्रेम कहानी,
बारिश में भीगते हुए एक सुनसान सड़क को निहारना,
कभी कभी अच्छा नहीं लगता क्या?
या चिलचिलाती धुप में एक पगडण्डी,
और दूर तक, मीलों तक,
न कोई छांव और न ही कोई मानुष,
कभी कभी वह भी सुकून नहीं देता क्या?
कलकत्ता की बरसती हुई दोपहरी में,
खिड़की के पास खड़े होकर,
सिगरेट पीते हुए टैगोर को पढना भी,
बहुत राहत देता है,
या फिर ट्राम में बैठे हुए मैदान * को देखते हुए गुजर जाना ,
अजीब सा है न सब कुछ,
लेकिन क्या सारे प्रश्न सचमुच इतने सिंपल होते हैं,
की आसानी से उनको समझा जा सके,
अगर इतना आसान होता,
तो शायद ..............................
शायद मैं कुछ और सोच रहा होता……

तारों को निहार रहा होता,
या फिर चलती हुई ट्रेन से दौड़ते हुए चाँद को चिढ़ा रहा होता,
उफ़्फ़…काश कुछ भी सिंपल होता मेरी लाइफ में,
कुछ भी,
पर जैसा भी है,
मुझे पसंद है,
ठीक तुम्हारी तरह।

-नीरज

* मैदान कोलकाता में है.

रविवार, 30 जून 2013

दो राहे ...:)

क्यू असमंजस में पड़ जाता हूँ
हर मोड़ पर दो राहें पाता हूँ.
किस राह को पकडू ओर किस राह को छोड़ू
कैसे इस गहरी सोच को तोड़ू

बदते कदमो के साथ
क्यू कुछ पीछे छूट जाने का होता हें एहसास
दोनो राहें ले जाती किसी डगर की ओर
बस एक की हें मंज़िल ओर एक का हें ना कोई छोर


क्या किया क्यू किया इस कशमकश में
छिड़ जाती दिल ओर दिमाग़ की तार
बस इन्ही दो राहो ने समेट रखा हें ज़िंदगी का सार!!


कुछ दिल से ब्लॉग से पूजा जी की एक बेहतरीन रचना आपके साथ साँझा कर रहा हूँ.....उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

@ संजय भास्कर 

बुधवार, 26 जून 2013

आत्म संतोष -- आशा जी



पहले भी रहे असंतुष्ट
आज भी वही हो
पहले थे अभाव ग्रस्त
पर आज सभी सुविधाएं
 कदम चूमती तुम्हारे
फिर प्रसन्नता से परहेज क्यूं ?
कारण जानना चाहा भी
 पर कोइ सुराग न मिल पाया
परन्तु मैंने ठान लिया
कारण खोजने के लिए
तुम्हें टटोलने के लिए |

जानते  हो तुम भी
सभी इच्छाएं पूर्ण नहीं होतीं
समझोते भी करने होते हैं
परिस्थितियों से ,
 यह भी तभी होता संभव
जब स्वभाव लचीला हो
समय के साथ परिपक्व हो
कुंठा ग्रस्त न हो  |
चाहे जब खुश हो जाना
अनायास गुस्सा आना
 उदासी का आवरण ओढ़े
अपने आप में सिमिट जाना |
कुछ तो कारण होगा
जो बार बार सालता होगा
वही अशांति का कारण होगा
जो चाहा कर न पाए
कारण चाहे जो भी हो |
क्या सब को
 सब कुछ मिल पाता है ?
जो मिल गया उसे ही
अपनी उपलब्धि मान
भाग्य को सराहते यदि
 आत्मसंतुष्टि का धन पाते |
सभी पूर्वनिर्धारित  है
भाग्य से ज्यादा कुछ न मिलता
जान कर भी हो अनजान क्यूँ ?
हंसी खुशी जीने की कला
बहुत महत्त्व रखती है
 कुछ अंश भी यदि अपनाया
जर्रे जर्रे में दिखेगी
खुशियों की छाया
फिर उदासी तुम्हें छू न पाएगी
सफलता सर्वत्र  होगी |
आशा

आशा जी एक पुरानी बेहतरीन रचना आपके साथ साँझा कर रहा हूँ...उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !


@ संजय भास्कर

सोमवार, 17 जून 2013

एक कदम तू चल तो सही -- आनन्द मेहरा



" तू चल तो सही अपने कदम,

हर हालत में कही न कही पहुच ही जायेगा.

बैठा रहेगा एक जगह पर तो,

वही पर रह जायेगा.

कदम छोटे ही भले ही चल,

मगर कदमो को रुकने मत दे,

नदी की तरह खुद अपने रास्ते बना लेगा.

कदमो को गर जरुरत पड़े तो थोडा विश्राम दे,

मगर एक जगह पर टिक अपने मंजिल से अपने को दूर मत कर.

चल चला चल कदमो से अपने कितनो के लिए रास्ते बनाता चल......!!!!


कारवां जारी है ब्लॉग से आनन्द मेहरा जी की एक बेहतरीन रचना आपके साथ साँझा कर रहा हूँ .....उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !


@ संजय भास्कर  

मंगलवार, 4 जून 2013

"तुम्हारा होना और ना होना"

धूप रोज़ की तरह आज भी बहुत तेज है,
सिगरेट पीते हुए,
रोज़ की ही तरह आज भी गरियाया धूप को,
सब कुछ वैसा ही है,
जैसे रोज़ हुआ करता है,
सुबह उठना, तैयार होना,
और चल देना रोज़ की भागमभाग में,
दौड़ते हुए, जैसे कहीं कुछ बदला ही नहीं,
तुम्हारा होना न होना न जाने क्यूँ नहीं खलता,
सुबह की पहली किरण आज भी माथा चूमती है,
जैसे पहले चूमा करती थी,
लेकिन तुलसी, उसका क्या करूँ,
वह खामोश हो गयी है,
उसके पत्ते झरने लगे हैं,
और छत वाला गेंदा कब का सूख गया,
कोनें में रखा तुम्हारा टेडी(पोनी) अब मुझे देख कर नहीं डरता,
खुलेआम आँखों में आँखें डाल देता है,
और मैं कुछ नहीं कर पाता,
तुम्हारी तस्वीर पर नज़र पड़ते ही हटा लेना चाहता हूँ,
लेकिन वह तुमसे हटती ही नहीं,
ऑफिस की कुर्सी खाली सी दिखती है,
और ऐसा लगता है जैसे अभी तुम आ जाओगी,
और पूछोगी कई सारे अनसुलझे सवाल,
जिनमे से कितनों का जवाब मेरे पास नहीं होगा,
अब महसूस होता है कि कितना कुछ बदल गया है,
साप्ताहांत अब जल्दी नहीं ख़तम होता,
कितना अंतर है तम्हारे होने और ना होने में,
एक धुएं का गुबार या फिर घना कुहासा,
तुमसे ही पूछ रहा हूँ, बताती क्यूँ नहीं?

-नीरज

शुक्रवार, 31 मई 2013

दुविधा...!!!!

मन ऐसो मेलन भरा, ते तन सुच्चो कैसो कहाय ...!
जे सोचु हरी ते पाप हरे, ते पूजन न सुहाय ...!!
ऐसो दुविधा सांस लगी, न निति कोई सुझाय ...!
तर जाऊ मैं पाप ते, या खुद ने देउ डुबोय ....!!

पथरीली राहें --- श्याम कोरी 'उदय'

मूंड खुजाते बैठ गया था
देख सफ़र की, पथरीली राहें
दरख़्त तले की शीतल छाया
लग रही थी, तपती मुझको !

फिर, चलना था, और
आगे बढ़ना था मुझको
राहें हों पथरीली
या तपती धरती हो
मेरी मंजल तक तो, चलना था मुझको !

कुछ पल सहमा, सहम रहा था
देख सुलगती, पथरीली राहें
फिर हौसले को, मैंने
सोते, सोते से झंकझोर जगाया !

पानी के छींटे, मारे माथे पर अपने
कदम उठाये, रखे धरा पर
पकड़ हौसला, और कदमों को
धीरे धीरे, चल पडा मैं !

पथरीली, तपती, सुलगती राहों पर
कदम, हौसले, धीरे धीरे
संग संग मेरे चल रहे थे
जीवन, और मंजिल की ओर !!
 
कडुवा सच ब्लॉग से श्याम कोरी जी की एक बेहतरीन रचना आपके साथ साँझा कर रहा हूँ .....उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

@ संजय भास्कर 

मंगलवार, 7 मई 2013

एक लोटा पानी और दो मुट्ठी चावल.....(कुँवर जी)





थोडा रूक कर सोचे तो देखेंगे कि हम इस तरह भी तो भगवद सेवा कर सकते है!हम मानव तो अपनी जरुरत की चीजो का संग्रह कर के रख ही लेते है और जितनी जरुरत होती है उस से कहीं अधिक ही संग्रह कर लेते है!पर ये बेजुबान,निरीह पशु-पक्षी.... अभी भूख लगी तो कही जाकर खा लिया और प्यास लगी तो जो पानी कही भी उपलब्ध हो गया पी लिया! कल तो बहुत दूर है,दूसरी बार खाने-पीने के लिए भी ये संग्रह नहीं करते!

यदि हम देखे हमारी संग्रह की आदत से हम इनको भी लाभ दे ही सकते है!जो हम अपने लिए संग्रह कर रहे है उसमे से कुछ हिस्सा इनके लिए निकाल ले,और रख दे कही ऐसी जगह जो इनकी पहुँच में हो सरलता से,और सुरक्षित भी हो!और सोचो कितना हमें इनके लिए निकालना है,बहुत कम मात्र ही इनके लिए पर्याप्त है!




एक लोटा पानी और दो मुट्ठी चावल,अनाज या जो भी अन्न हमें आसानी से मिल जाता हो!बस इतने से ही हम अपनी भगवद सेवा कर सकते है!हाँ,बदले में इन्हें खाने-पीने वाले पंछी आपको धन्यवाद बोलने तो नहीं आयेंगे पर आपको अनुभव जरूर होगा कि आपको धन्यवाद मिल गया है!अरे सोचना कि नहाने में एक लोटा पानी कम प्रयोग कर लेंगे, मंजन में थोडा कम पानी खर्च लेंगे.... और कितनी ही ऐसी गैरजरूरी पानी की बर्बादी को कम कर के हम ये एक लोटा पानी रोज निकाल ही सकते है और जिनमे हमें कुछ कमी भी महसूस नहीं होगी उस एक लोटे पानी की!

जरुरत है तो बस एकबार सच्चे मन से संकल्प करने की कि अब मुझे हर रोज एक लोटा पानी और दो मुट्ठी चावल पंछियों के लिए निकालने ही है और छत पर,झांकी में या कही भी उनकी सरलता से पहुँच वाली जगह रखनी है......बस! फिर तो भगवान् भी आपको नहीं रोक सकता उन पंछियों के लिए ऐसा करने से!


जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

शनिवार, 4 मई 2013

सफ़ेद आसमाँ -- पूजा शर्मा


जब भी परेशान होती हूँ
और कुछ सूझता नहीं...
तब आ जाती हूँ
इस सफ़ेद दुनिया में
और भरने लग जाती हूँ
अपना पसंदीदा रंग इसमें...


जिधर दिल कहता है
उसी दिशा में चलती हूँ...
जो मन में आता है
वही चित्र बनाती हूँ...
और तब तक अपना paint-brush चलाती हूँ
जब तक
दिल-दिमाग़ शांत न हो जाए
और वो बोझ न हट जाए,
भीतर से निकल न जाए...

जो लेकर मैं
इस सफ़ेद आसमाँ के पास आई थी.....!!!

Desire ब्लॉग से मेरी बहन पूजा शर्मा की एक बेहतरीन रचना आपके साथ साँझा कर रहा हूँ .....उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

@ संजय भास्कर


सोमवार, 29 अप्रैल 2013

एक मुलाकात -- डॉ निशा महाराणा


सुबह का समय था
दिवाकर सात घोडों के रथ पे
होके सवार
अपनी प्रिया से मिलकर
आ रहा था
पवन हौले-हौले पेड की डालियों औ
पत्तों को प्यार से सहला रहा था
समाँ मनभावन था अचानक-
मेरी आँखें उसकी आँखों से मिली
उसने मुझको देखा
मैनें उसको देखा
मैं आगे बढी
उसने पीछे से  मारा झपट्टा
औ पकड लिया मेरा दुपट्टा
मैं पीछे मुडी उसे डाँटा
वो भागा पर-------
पुनः आगे आकर
मेरे रास्ते को रोका
औ मेरी आँखों में झाँका
उसकी आँखों में झाँकते हुये
महसुस हुआ
उसका प्यार बडा ही सच्चा था क्योंकि वो---------
आदमी नहीं बंदर का बच्चा था !!

My Expression ब्लॉग से डॉ निशा महाराणा जी की एक बेहतरीन रचना आपके साथ साँझा कर रहा हूँ .....उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

@ संजय भास्कर


बुधवार, 24 अप्रैल 2013

दिन में फैली ख़ामोशी -- संजय भास्कर


जब कोई इस दुनिया से
चला जाता है
वह दिन उस इलाके के लिए
बहुत अजीब हो जाता है
चारों दिशओं में जैसे
एक ख़ामोशी सी छा जाती है
दिन में फैली ख़ामोशी
वहां के लोगो को सुन्न कर देती है
क्योंकि कोई शक्श
इस दुनिया से
रुखसत हो चुका होता है ...........!!!!!

 
चित्र - गूगल से साभार

 
@ संजय भास्कर 

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

न धूर्त बनें, न मूर्ख कहलाएं

कई बार ऐसा होता है कि कुछ लोग उतने अच्छे नहीं होते जितने समझे जाते हैं और कई बार इसके उल्ट भी होता है कोई व्यक्ति विशेष उतना बुरा नहीं होता , जितना वो समझा जाता है । यदि किसी की छवि नकारात्मक है तो जरूरत है सोचने की । कहते हैं धुआँ वहीं उठता है यहाँ आग होती है । जरूर उस व्यक्ति विशेष के कुछ कृत्य ऐसे रहे होंगे जिन्होंने उसे बुरे के रूप में प्रचारित किया होगा । फिर यह धारणा मजबूत होती जाती है और अच्छाइयां बुराई के स्याह पर्दे में आलोप हो जाती हैं । 
               " हमने लोगों से क्या लेना है ", " लोगों का तो काम ही नुक्ताचीनी करना है " - ऐसी धारणाएं , ऐसी जीवनशैली छवि को और बिगाडती है । सामाजिक प्राणी के नाते लोग आपके बारे में क्या सोचते हैं , क्या कहते हैं यह काफी महत्वपूर्ण है । यह ठीक है कि हमें अपने ढंग से जीने का पूर्ण अधिकार है लेकिन इतना आत्ममंथन तो हमें करना ही चाहिए कि अगर हम बुरे के रूप में कुख्यात हैं तो क्यों ? ऐसा सोचने के बाद ही यह प्रश्न आयेगा कि कैसे इस छवि को सुधारा जा सकता है । 
               यह सच है कि अच्छा दिखना उतना महत्वपूर्ण नहीं , जितना कि अच्छा होना और इस नकाबपोश दुनिया में ऐसा भी होता है कि अच्छे दिखने वाले अच्छे होते नहीं , लेकिन आपका अच्छा होना भी तब बेकार हो जाता है जब आप अच्छे दिखते नहीं । अगर आपकी कोई एक बुराई सबको दिखने लग गई तो आपकी सौ अच्छाइयां भी उसमें छुप जाएंगी । 
                         सिर्फ अच्छा दिखना और वास्तव में अच्छा न होना यहाँ धूर्तता है, वहीं अच्छा होना और बुरा दिखना मूर्खता । और अगर हम चाहते हैं कि हम न धूर्त बनें और  न मूर्ख कहलाएं तो हमें अच्छा बनने के साथ अच्छा दिखने का भी प्रयास करना होगा । 


**********

रविवार, 31 मार्च 2013

कुछ क्षणिकायें

( 1.)  कमाल
 21 वी सदी में देखो
लोकतंत्र का कमाल अब पढ़े लिखे भी
वोटिंग मशीन पर
लगाते है अंगूठे से निशान !

 

( 2.)  फिल्मे 

आजकल चल रही फिल्मे
कर रही है कमाल
जिन्हें देख शर्म भी खुद
शर्म से हो रही है लाल ..........!



@ संजय भास्कर

मंगलवार, 26 मार्च 2013


........वो बार बार धमकाए चले जाते हैं ...

होली आते ही पतिदेव एलान कर देते हैं
रंग चेहरे को खराब कर देते हैं  
हम न खोलेंगे दरवाज़ा
न खेलेंगे फाग होली
वो बार बार धमकाए चले जाते हैं ......

न किसी  का फ़ोन उठाएंगे
न किसी को घर बुलायेंगे
किसी की बातो में न आयेंगे
बेमतलब ही भीगने न जाएँगे
वो बार बार धमकाए चले जाते हैं ......

इतने सालो के साथ का असर
कर देते हम धमकियाँ बेअसर
हाँ में हाँ मिलाते चले जाते हैं
कैसे भिगोये उन्हें हर बार
मंसूबे बनाये चले जाते हैं
वो बार बार धमकाए चले जाते हैं ......

देकर लालच मेवे वाली गुझिया का
मना लेते हैं हम मन अपने रसिया का
माथे पर इक छोटा सा तिलक लगायेंगे
रंग गीला नहीं बस सुखा  ही लगायेंगे
बस बार ये तसल्ली दिए जाते हैं
वो बार बार धमकाए चले जाते हैं .....
 
टीका लगाने  का ढोंग करते जाते हैं
उन्हें अपने प्यार में रँगे चले जाते हैं
कसमें भूल वो हममें समाये जाते हैं
आँखों ही आँखों से वार किये जाते हैं
होली में पिया के संग यूँ जिया करते हैं
वो क्यों बार बार धमकाए चले जाते हैं ...





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