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सोमवार, 3 दिसंबर 2012

कभी तुमसे -- सदा जी




















प्रेम ...... कभी तुमसे 
तुम्‍हारे दिल की कहता है 
कभी तुम्‍हारे दिल की सुनता है 
लेकिन तुमसे वो  नहीं कहता 
जो तुम्‍हें पसन्‍द नहीं 
वो तुमसे डरता है ...शायद 
ये डर भी  इसे 
इसी प्रेम ने दिया है 
क्‍योंकि इसने तुम्‍हारी खुशियों के साथ 
अपनी खुशियां देकर 
सौदा कर लिया है मन ही मन 
तुम जरा सा भी ना-खुश हो 
वह बात इसे मंजूर नहीं होती
बस इसे यही डर सताता है 
ये बात कहीं तुम्‍हें  नागवार गुजरी तो  ... 
तुम्‍हारा दिल दुखी होगा 
वो हंसता है तुम्‍हारी हंसी में 
रोता है तुम्‍हारे अश्‍क बहने पे
बहते हुए अश्‍कों के बीच
कभी कर देता है चुपके से
प्रेम ये सवाल भी .... ?
बिखरता है दर्द जब 
हद से ज्‍यादा 
कुरेद के  ज़ख्‍मी हिस्‍से को 
गहराई तक उतरकर
नमी को समेटकर 
जाने कैसे अश्‍क बना देती हैं आंखे  .....!!


सदा जी एक पुरानी बेहतरीन रचना आपके साथ साँझा कर रहा हूँ ..... उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

@ संजय भास्कर 



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