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रविवार, 7 अक्तूबर 2012

कविता....बावरा सा मन

                    
तेरी यादों को कितना भी समेट लू
फिर भी तन्हा रहता है मन
वादे खुद से कितने भी कर लूँ ,
फिर भी बेक़रार हो जाता है मन
शिकवे तुझसे कितने भी कर लूँ
फिर भी तड़प जाता है मन
रह न सकू तुझ बिन, कुछ कह न सकू
न जाने क्यूँ खोया सा रहता है मन
दिल की चाहत है ,दिल की लगी है
मिल पाऊं या नहीं कभी तुझसे
बस तुझे देखने को चाहता है मन
डर बेशक लगता है जुदाई से
फिर भी बार बार बहकता है मन
बहस फ़िज़ूल है ,चाहत कबूल है
फिर भी मेरा घबराता है मन
तकरार भी करता .इकरार भी करता है
फिर भी तुम्हें क्यूँ अपनाता है मन
न छोड़ते बनता है ,न मिलते बनता है
दीवानों जैसी हरकते करवाता है मन
बता दो ऐ दोस्त वादा कर लो ऐ दोस्त
मैं निभा न पाऊं पर तुम निभाओगे मेरा साथ
ये दलीलें हर वक़्त मांगता है मन |
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