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गुरुवार, 11 अक्तूबर 2012

आखिरी सफर

ये जानते हुए कि
मैं छोड़ी जा चुकी हूँ
फिर भी एक इंतज़ार है
कि तुम ....खुद से
अपनी गलती  स्वीकार करो 
ताकि मैं लौट सकूँ
जहाँ से मैं आई हूँ 

पर  मैं जानती हूँ 
ये सब भ्रम है मेरे ही मन का |
हां ....सीता के देश में
मैं ..सीता सी नहीं हूँ
वो ,कर्तव्यों के लिए
त्यागी गई
और मैं ...अपने प्यार में 

 धोखे की खातिर...
अपवित्र ,और खरोंचा हुआ शरीर लेकर 
खुद पर लज्जित हूँ
और अब तो दिल पर
एक बोझ सा लदा है
अपनी ही किस्मत का |

मेरे लिए अब ये जरुरी था
कि ढूँढतीं फिरूं ,
अपने जिस्म को ढोने के लिए
वो चार कंधे ,
जिस पर तय करना है,मुझे अब ये
आखिरी सफर ||




अंजु (अनु )

5 टिप्‍पणियां:

  1. म्हारा हरयाणा पर आपकी पहली पोस्ट का हार्दिक स्वागत है
    आगाज शानदार है...........

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

      हटाएं
  2. maarmik.....
    masumiyat ke chhale jaane ke bad bas yahi intjaar reh jata hai bas!
    behad sadhe huye shabdo me sateek baat!

    kunwar ji

    उत्तर देंहटाएं
  3. अनु जी बेहद सुन्दर रचना है बहुत-२ बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  4. अनु जी
    नमस्कार !
    म्हारा हरियाणा ब्लॉग पर आपका स्वागत है | आपके शानदार तरीके से आगाज किया है | इसी तरह से अपनी भागेदारी बनाए रखिए !

    सहयोग के लिए आभार |
    संजय भास्कर

    उत्तर देंहटाएं

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