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गुरुवार, 11 अक्तूबर 2012

सबके कंधे झुक जाते हैं

ये लौ बुझनी है साँसों की,
जल-2 कर तन के चूल्हों में,

सोने-चाँदी का क्या करना,
इक दिन मिलना है धूलों में,

काँटों से डर कर  क्यूँ जीना,
जी भर सोना है फूलों में, 

सबके कंधे झुक जाते हैं,
जब कर बढ़ता है मूलों में, 

हर पल जीता है मरता है,
झूले जो दिल के झूलों में, 

10 टिप्‍पणियां:

  1. उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  2. हर पल जीता है मरता है,
    झूले जो दिल के झूलों में,
    -----------लाजवाब

    उत्तर देंहटाएं
  3. सोने-चाँदी का क्या करना,
    इक दिन मिलना है धूलों में....बहुत सुन्दर प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह ... बेहतरीन प्रस्‍तुति।

    उत्तर देंहटाएं

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