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गुरुवार, 9 अगस्त 2012

बोझिल बचपन...!!!


झुलसी नन्हे बचपन की फुहार, सिमटता नन्हे सपनो का संसार..!
हर समय मजबूरी का चोला ओढ़े, झेलते स्वार्थी  समाज का तिरस्कार...!!

वो नन्हा मटमैला सा मासूम, जिस पर छाई मजदूरी की धुप...!
न खिलोनो से खेले कोई खेल, न जाने कागज़ पेंसिल का आकार...!!

कभी चाय की दूकान पर बैठे, कभी स्टेशन तो कभी कारखाना...!
कभी सडको पर पत्थर वो तोड़े, छोटे हाथो में लिए बड़े औजार...!!

दिन के भूख की चिंता वो करते, साथ पढने की इच्छा भी गढ़ते...!
बस दो रोटी से पेट भरने को, दिन भर मजदूरी को भी तैयार..!!

कितने ही कानून मढ़े गये, करने को बाल श्रम का सुधार..!
फिर भी सवाल बना हुआ है, कैसे होगा बोझिल बचपन का उद्धार..!!




4 टिप्‍पणियां:

  1. सरकार की लाख कोशि शो के बाबजूद भी बाल मजदूरी नही रूक रही है इसमे भी कही ना कही खामिया है अति उत्‍तम प्रस्‍तुति
    यूनिक तकनीकी ब्लाग

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  2. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति के साथ ही एक सशक्त सन्देश भी है इस रचना में।

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुन्दर। स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।वन्दे मातरम्...

    उत्तर देंहटाएं

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