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शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

सोमवार, 27 अगस्त 2012

सुबह.. !!!

आज सुबह उदास सी हैं...
न जाने क्यों. कुछ चुपचाप सी है.
आँखों में बंद पानी लिए..
आज सुबह कुछ ख़ास सी है..


शायद वो रात भर सो नहीं पाई..
तभी इतनी बदली हुई सी हैं..
या शायद किसी ने दिल दुखाया है.
तभी इतनी मायूस सी हैं..


ऐसा क्या हुआ उसके साथ
क्यों किसी को कुछ नहीं बताती..
या फिर कोई उसे समझ ही नहीं सकता.
तभी अपनी तकलीफ नहीं दिखाती..!!


आज सुबह उदास सी हैं...
न जाने क्यों. कुछ चुपचाप सी है.!!!

रविवार, 19 अगस्त 2012

नारी पर लेख - नारी की असली पहचान का कायल है समाज ?

ये  बात तब एक प्रश्नचिन्ह के साथ सामने आती है जब एक औरत अपने बच्चो को स्कूल से अपनी कार में लाते वक़्त ट्रेफिक सिग्नल के पास आगे पीछे खड़ी गाड़ियो में फंस जाती है और वहाँ से  निकलने की कोशिश करती है तभी एक दो और गाड़ियो में सवार सभ्य पुरुष बजाए उस महिला की मदद करने के, आँखे दिखाते अपनी बड़ी गाडी से निकलते हुए बोलते हैं कि ''मैडम जब गाडी चलानी नहीं आती तो चलाते ही क्यों हो? आ जाती हैं न जाने कहाँ कहाँ से ....रास्ता रोक के खड़ी हैं कब से ?हमे पहले ही इतनी देर हो गई है ,ये मैडम हैं कि और देर करवा रही हैं..!

    इतने में आवाज़ सुनकर महिला ट्रेफिक पुलिस आती है और वहां से भीड़ को हटाने और उन् 'सभ्य 'कहलाने वाले पुरुष को शांति से नियम मानने का आदेश देती हैं और उस कार वाली महिला को अपनी गाडी निकलने का निर्देश देती है लेकिन यह सुनते ही वही व्यक्ति आग बबूला हो जाता है ..बिना जाने समझे की किसकी गाडी आगे है किसकी पीछे या ट्रेफिक महिला पुलिस के निर्देश को माने बिना बोलता जाता है ....वाह भई वाह !अरे  मैडम जी ये औरत न तो गाडी चला रही है न हमे आगे जाने दे रही है....और आप हो की उसको ही पहले जाने को बोल रही हो..ऐसा नहीं चलेगा....!हम लेट हो रहे हैं !और व्यर्थ ही गुस्से से उस महिला कार चालक से बदतमीज़ी पर उतर आया ...ओ मैडम !..नहीं  आती न तोह न चला ..घर में बैठ ...हट गाडी हटा ...! और उस व्यक्ति ने न तो  उस महिला कार चालक का ,न ही ट्रेफिक महिला पुलिस का सिर्फ उनका ''औरत '' होने की वजह से कुछ भी लिहाज़ किया !

तो प्रश्न उठता है कि क्या आज भी नारी कितनी भी आगे बढ जाए उसको वही सम्मान मिल पा रहा है ?क्या केवल पुरुष ही सही काम करते हैं?क्या उनको ही सिर्फ गाडी चलानी आती है और उनसे कोई गलती या दुर्घटना नहीं होती ?जहाँ जरा सी भी नारी से चूक हुई नहीं कि पुरुष वर्ग आँखे तरेर कर हाथ घुमा कर औरत को खरी खोटी सुनाने से बाज़ नहीं आता !क्या उस भीड़ में से कोई और पुरुष आगे आकर उस महिला की मदद करने और उस बदतमीज़ पुरुष को चुप करवाने नहीं आ सकता था?  नहीं...!क्यों कि सब को ही देर हो रही थी !या फिर वो शायद उस व्यक्ति की  अनजाने में ही हाँ में हाँ मिलाने की कवायद में थे ! 
ऐसा क्यों होता है कि पुरुष वर्ग महिला वर्ग को आगे बढता देख नहीं पाता? महिलाओ को आगे लाने और उनका  साथ देने की दलीले खोकली साबित क्यों  हो जाती हैं ? देश को आगे बढ़ाने में समाज का योगदान होता है और वही समाज केवल पुरुष प्रधान तो नहीं है ?उस में नारी का भी  तो बराबर का योगदान है !फिर हमारा समाज शहरो  कस्बो ,जिलो के मिश्रण से बना है पर अफ़सोस  कि समाज के इन्ही महत्पूर्ण हिस्सों के लोगो में औरत की स्तिथि  आज भी वही है  जहाँ छोटी से छोटी बातो के लिए भी औरत को ज़लील करने से  पुरुष पीछे नहीं हटता! नारी के अधिकारों की अवहेलना की जाती है ! कुछ भी अच्छा करना हो या नया करना हो तो शुरुआत अपने घर से ही की जाती है ताकि उस शुरुआत से बड़े परिवर्तन को आकार दिया जा सके !
फिर अगर अपने घर की नारी हो या  दुसरे घर की, नारी का अपमान करके  क्या एक अच्छे समाज का निर्माण हो सकता है? नारी का मानसिक शोषण करना छोड़ कर उसके सहयोग से ही उसके अस्तित्व को स्वीकार कर के ही  एक स्वस्थ समाज की सरंचना हो सकती है !ऊपर वर्णित घटना मात्र एक छोटा सा उदाहरण है नारी के मानसिक शोषण का !जो नारी एक अच्छी पत्नी,माँ,बहन,के साथ साथ देश की बागडोर सँभालने और चांद की ऊँचाइयों को भी छूने की क्षमता रखती है क्या वो उस पुरुष को मुह तोड़ जवाब नहीं दे सकती थी? दे सकती थी ! पर चुप थी तो अपनी बगल में बैठे बच्चो को देख कर जो उस असभ्य व्यक्ति की आवाज़ सुनकर सहम गए थे और वो  औरत अपने बच्चो को प्यार से सहला रही थी या फिर वो खामोश थी तो अपने अन्दर निहित संस्कारो की वजह से क्यों कि वो उस असभ्य पुरुष से दो चार होकर खुद को असभ्य कहलाने से बच कर अपने बच्चो के साथ सुरक्षित अपनी मंजिल की ओर बढना चाहती थी !ये भी तो एक नारी के महान होने का सबूत है जहाँ  वो अपने व्यवहार ,अपनी ममता का लोहा मनवाने से पीछे नहीं हटती!

बुधवार, 15 अगस्त 2012

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ता हमारा

म्हारा हरियाणा ब्लॉग की ओर से आप सभी ब्लोगर मित्रों को स्वतंत्रता दिवस की ढ़ेरों शुभकामनाये........!!!!
@ संजय भास्कर

गुरुवार, 9 अगस्त 2012

बोझिल बचपन...!!!


झुलसी नन्हे बचपन की फुहार, सिमटता नन्हे सपनो का संसार..!
हर समय मजबूरी का चोला ओढ़े, झेलते स्वार्थी  समाज का तिरस्कार...!!

वो नन्हा मटमैला सा मासूम, जिस पर छाई मजदूरी की धुप...!
न खिलोनो से खेले कोई खेल, न जाने कागज़ पेंसिल का आकार...!!

कभी चाय की दूकान पर बैठे, कभी स्टेशन तो कभी कारखाना...!
कभी सडको पर पत्थर वो तोड़े, छोटे हाथो में लिए बड़े औजार...!!

दिन के भूख की चिंता वो करते, साथ पढने की इच्छा भी गढ़ते...!
बस दो रोटी से पेट भरने को, दिन भर मजदूरी को भी तैयार..!!

कितने ही कानून मढ़े गये, करने को बाल श्रम का सुधार..!
फिर भी सवाल बना हुआ है, कैसे होगा बोझिल बचपन का उद्धार..!!




शनिवार, 4 अगस्त 2012

एक सवाल ?????????


Boys बहुत conscious होते है अपनी sisters के लिए. वो कभी नहीं चाहते की उनकी sister किसी boy से बात करे.... पर जब बात किसी और की sis की आती है तो वो ये उम्मीद क्यों करते है उनकी colleague या classmate उनके लिए open हो ??????

http://anuragisuman.blogspot.in/
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