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शुक्रवार, 1 जून 2012

................गरीब हूँ मैं




रोटी के लिए घूमता रहता हूँ ,
इधर उधर ,
पाँव छिल जाते है ,
रुकता नही हूँ मगर ,
दिल से देगा मुझे कोई उसे भगवान् उसे बहुत देगा
मेरी दुआ है सभी के लिए ,
चाहे कोई बड़ा हो या छोटा ,
 मिटटी के खिलौनों से खेलते है बच्चे मेरे ,
गर्मी सर्दी बारिश को  हंस कर झेलते है
सर पर छत भी न दे सका अपने बच्चो को
बाप में अजीब हूँ
गरीब हूँ में मजबूर हूँ मैं ,
पूरी नही कर पाता बच्चो की इच्छाओ को ,
बहुत ही बदनसीब हूँ मैं ,
गरीब हूँ मैं गरीब हूँ मैं......


@  संजय भास्कर

7 टिप्‍पणियां:

  1. गरीब आदमी इतनी महंगाई में अपने बच्चों की सभी हसरतें पूरी कहाँ कर पाता है |
    गरीबी की दास्तान बयान करती मार्मिक रचना |

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  2. बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
    घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
    लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    उत्तर देंहटाएं
  3. धरातल को देखने का प्रयास ,नंगी आखों से अच्छा है ...बेहतरीन रचना ...

    उत्तर देंहटाएं
  4. गरीबी की दास्तान बयान करती मार्मिक रचना

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुन्दर चित्रण...उम्दा प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

    उत्तर देंहटाएं

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