समर्थक

यह ब्लॉग हरियाणा के ब्लॉग लेखकों को एक मंच पर लाने के उद्देश्य से निर्मित किया गया है | हरियाणा के सभी ब्लॉग लेखकों से निवेदन है कि वे इस ब्लॉग से न सिर्फ जुड़ें अपितु अपनी पोस्ट से इसे समृद्ध बनाएँ अगर अलग से पोस्ट न लिख पाएँ तो अपने ब्लॉग पर लिखित पोस्ट का लिंक ही लगाकर भागेदारी बनाए रखें |
इस ब्लॉग से लेखक के रूप में जुड़ने के लिए -------- dilbagvirk23@gmail.com -------पर ईमेल करें |

LATEST:


विजेट आपके ब्लॉग पर

रविवार, 29 अप्रैल 2012

कैसे -कैसे लोग


कैसे -कैसे लोग

अगर हो मन में कुछ करने का जज्बा ,
तो कुछ भी कर जाते हैं , लोग |
देखा जाये तो लाखों लोग गरीब हैं यहाँ,
फिर भी विदेशों के बैंक भर जाते हैं, लोग|
जिन्होंने पैदा किया , काबिल बनाया ,
वक़्त आने पर उन्ही से किनारा कर जाते हैं लोग |
कई बार लाखों रूपये देकर भी , नौकरी नहीं मिलती ,
वरना एक सिफारिस से भी तो , तर जाते हैं लोग |
मैं किश्ती लेकर भी नदी पार कर न सका ,
वरना एक तिनके से भी तो दरिया पार कर जाते हैं ,लोग|
सारी जिन्दगी झूठ बोला , फरेब किया ,पैसा कमाया ,
और आखिर एक दिन मर जाते हैं ,लोग |

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

डॉक्टर साहब(हास्य-वयंग्य)......(कुँवर जी)

बात उन दिनों की है जब कुंवर जी अपना 3 वर्षीय अभियांत्रिकी का उपाधि-पत्र  प्राप्त करने के पश्चात भी गाँव में ही समय व्यतीत कर रहे थे!कुछ दिन नौकरी भी कर ली थी,छूट गयी थी किन्ही कारणों से!तब तक स्नातक भी हो चुके थे 'अर्थशाश्त्र' जैसे विषय से!बावजूद इसके भी कुंवर जी घर पर ही समय व्यतीत कर रहे थे!बैठक में एक नीम का पेड़ पूरा दिन साथ निभाता था उन दिनों हमारा!ऐसे ही एक दोपहर हमने गौर की कि एक हमारा पुराना मित्र;जो विद्यालय में हमारे साथ ही पढता था,या यूँ कहिये कि साथ छुपा करते थे कक्षा से!तभी की मित्रता थी जो बस तब तक ही थी!

हाँ तो वो मित्र,हमने देखा के वो डॉक्टर बन गया है!हमारे अचरज का तो कोई ठौर-ठिकाना ही नहीं था! ये देख कर नहीं के वो डॉक्टर बन गया है,बल्कि ये देख कर कि वो अति-व्यस्त भी है!हर घंटे में उसके दो-तीन चक्कर लग जाते थे प्रतिदिन ही!मतलब धंधा खूब चल रहा था!कमाई भी खूब हो रही होगी!'एक वो' जिसने 10वी तो शायद कर ही ली थी जैसे-कैसे भी,वो आज गाँव का एक अति-व्यस्त डॉक्टर है और 'एक हम' जो इतनी उपाधिया प्राप्त करने के पश्चात भी गाँव में खाली बैठे है "बेरोजगार"!
जब भी 'वो' अपनी साईकिल पर पता नहीं क्या गुनगुनाता हुआ हमारे सामने से गुजरता तो सांप से लोटते थे हमारी छाती पर!
                                                                          और उस दिन तो हमसे रहा ही नहीं गया!जो खार मन में इक्कट्ठा होता जाता था इतने दिनों से, सोचा आज कुछ तो बहार निकाल ही दे! अपनी पूरी अदाकारी झोंक दी हमने उस से बात करने में!
                                                                                                            शुक्र है के मन में जो बाते-भावनाए होती है,उनकी झलक बहार नहीं मिलती कैसे भी!ना ही उनमे से कोई विशेष प्रकार कि गंध फैलती है वातावरण में!जैसे अच्छी भावनाओं से सुगंध और बुरी से दुर्गन्ध!ऐसा होता तो किसी से बात करना ही असंभव हो जाता हमारा तो!पर शुक्र है कि ऐसा नहीं है!
     तो हमने उसे एक दिन रोक ही लिया!आँखों समस्त प्रेम उड़ेल दिया हमने,जितना हम उड़ेल सकते थे,समस्त!अब चमक तो स्वाभाविक ही आनी थी आँखों में!उसे तो ऐसा लगा होगा जैसे हमे तो इच्छित वर ही मिल गया हो उस से मिल कर!पुरानी स्मृतियों को बैसाखी बना कर बात-चीत करने के लिए खड़े हो गए हम तन कर!जितनी जलन मन में होती थी उसे देख कर,आँखों में उतना ही संतोष!

पूछने पर पता चला के बच्चे,बूढ़े,जवान,औरत और तो और जानवरों तक का इलाज वो सफलतापूर्वक कर लेता था!

अब बैसाखी कमजोर पड़ती दिखाई दी तो जो असल बात थी मन में वो निकाल ही दी उसी अदाकारी से!
                                                         
लघभग चापलूसी सी करते हुए पूछ ही लिया उसकी सफलता का राज!
अब जैसे उसकी तो दुखती हुई रग दब गयी हो जैसे!जो प्रसन्नता थी मुख-मंडल पर सब गायब!एक पुरानी दास्ताँ जो खुशियों से शुरू हुई थी,अब ग़मो कि और बढ़ चली थी!

पता लगा कुछ भी तो अलग नहीं था उसकी और हमारी स्थिति में!बस हमारे पास एक-दो उपाधियो के साथ का अनुभव था और उसके पास केवल 10वी के साथ का!

हालात एक थे,फिर ये वयस्तता कैसी?

चलती बात पर अपनी ये कुण्ठा भी हमने ख़त्म करनी चाही!अब थोडा आत्मविश्वाश भी आ रहा था हमारे अन्दर!अंततः ये भी पूछ ही लिया हमने!

अब जो जवाब आया,उसमे उस बन्दे की सारी दार्शनिकता उभर आई!

वो बोला,"कैसी वयस्तता भाई?कोई दवाई लेने मेरे पास आता ही नहीं,साईकिल पर डॉक्टर का झोला टाँगे इसलिए गाँव में घूमता रहता हूँ के कोई देख कर ही रोक ले कुछ दवाई लेने के लिए!पर कोई रोकता भी नहीं!"

बस !

अब तो जैसे मन के सारे ऋण चुकते हो गए हो!सारा अभिनय ख़त्म!सच्ची प्रसन्नता आँखों में झलक आई,एक विजयी मुस्कान होंठो पर थिरक गयी!मंतव्य पूर्ण हो चुका था अपना तो,पर उसका वाक्य जारी था!मगर अपने किस काम का!
                                                                                                    
 जो सुनना था सुन लिया था,संतुष्टि हो जाने पर सब व्यर्थ जान पड़ता है!सो कुछ और सुनाई ही नहीं दे रहा था!खुद के लिए जो अपमान मन में पनप रहा था कुछ कम हुआ!अब एक बात और सोची के जब वो ये जानते हुए भी कि उस से कोई दवाई नहीं लेता है फिर भी गाँव में घूमता है ये सोच कर कि आज तो कोई ले ही लेगा,तो मै क्यों अभी तक गाँव में ही पड़ा हूँ!जब करनी नौकरी ही है तो कही तलाश क्यों नहीं कि जाए?मिल भी जायेगी एक दिन!और आज मै कर रहा हूँ नौकरी!


जय हिंद,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

इस देश में आतंकवादियों क्या है तुम्हारा ...!



इस देश में आतंकवादियों क्या है तुम्हारा 
यहाँ से चले जाओ अब ये देश है हमारा ।
सुला देंगे हम तुम्हे नींद सुकून की 
तुम्हे ख़त्म करना ही है नारा हमारा ।
हमारे दिल की भड़ास को तुम्हारे दिल में बसा देंगे
तुम्हे ही क्या हम तुम्हारी हस्ती को मिटा देंगे ।
बहुत दिनों से सह रहे अत्याचार तुम्हारे 
इस देश की भूमि पर पाँव रखते ही मिटा देंगे ।
तुम्हारे दिए दुखो को हम खुशियों से भुला देंगे 
देश के जख्मो पर अब मलहम लगा देंगे !
मासूमो का खून बहाने वालो तो टोक देंगे
देश दुश्मनों को सरहद पार ही रोक देंगे .........!


मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

" मतलब की दुनिया "

                   " मतलब की दुनिया "


मतलब  की है दुनिया यारो
                                           मतलब की है दुनिया ....
ये न किसी के मीत हैं
                                     न इनकी किसी से प्रीत है ,
रिश्ते -नाते अपना -पराया
                                      सब झूठी जग की रीत है ,  
अपना न बनेगा कोई यहाँ
                                                           चाहे इन पे जान भी वारो  ,

मतलब की है दुनिया यारो .................................

अपने मतलब के लिए
                                        प्रेम भी दर्शाते हैं लोग ,
अपने मतलब के लिए
                                      पत्थर को भी लगाते हैं भोग ,  
अपने मतलब के लिए 
                                            फूल भी बरसाते हैं लोग , 
मतलब निकल जाने पर 
                                         पत्थर भी बरसाते हैं लोग ,
बिना  मतलब न सुनेगा कोई 
                                                               चाहे चीख- चीख  कर पुकारो ,   


मतलब की है दुनिया यारो .................................


                        
    
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...
MyFreeCopyright.com Registered & Protected