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मंगलवार, 7 मई 2013

एक लोटा पानी और दो मुट्ठी चावल.....(कुँवर जी)





थोडा रूक कर सोचे तो देखेंगे कि हम इस तरह भी तो भगवद सेवा कर सकते है!हम मानव तो अपनी जरुरत की चीजो का संग्रह कर के रख ही लेते है और जितनी जरुरत होती है उस से कहीं अधिक ही संग्रह कर लेते है!पर ये बेजुबान,निरीह पशु-पक्षी.... अभी भूख लगी तो कही जाकर खा लिया और प्यास लगी तो जो पानी कही भी उपलब्ध हो गया पी लिया! कल तो बहुत दूर है,दूसरी बार खाने-पीने के लिए भी ये संग्रह नहीं करते!

यदि हम देखे हमारी संग्रह की आदत से हम इनको भी लाभ दे ही सकते है!जो हम अपने लिए संग्रह कर रहे है उसमे से कुछ हिस्सा इनके लिए निकाल ले,और रख दे कही ऐसी जगह जो इनकी पहुँच में हो सरलता से,और सुरक्षित भी हो!और सोचो कितना हमें इनके लिए निकालना है,बहुत कम मात्र ही इनके लिए पर्याप्त है!




एक लोटा पानी और दो मुट्ठी चावल,अनाज या जो भी अन्न हमें आसानी से मिल जाता हो!बस इतने से ही हम अपनी भगवद सेवा कर सकते है!हाँ,बदले में इन्हें खाने-पीने वाले पंछी आपको धन्यवाद बोलने तो नहीं आयेंगे पर आपको अनुभव जरूर होगा कि आपको धन्यवाद मिल गया है!अरे सोचना कि नहाने में एक लोटा पानी कम प्रयोग कर लेंगे, मंजन में थोडा कम पानी खर्च लेंगे.... और कितनी ही ऐसी गैरजरूरी पानी की बर्बादी को कम कर के हम ये एक लोटा पानी रोज निकाल ही सकते है और जिनमे हमें कुछ कमी भी महसूस नहीं होगी उस एक लोटे पानी की!

जरुरत है तो बस एकबार सच्चे मन से संकल्प करने की कि अब मुझे हर रोज एक लोटा पानी और दो मुट्ठी चावल पंछियों के लिए निकालने ही है और छत पर,झांकी में या कही भी उनकी सरलता से पहुँच वाली जगह रखनी है......बस! फिर तो भगवान् भी आपको नहीं रोक सकता उन पंछियों के लिए ऐसा करने से!


जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

शनिवार, 4 मई 2013

सफ़ेद आसमाँ -- पूजा शर्मा


जब भी परेशान होती हूँ
और कुछ सूझता नहीं...
तब आ जाती हूँ
इस सफ़ेद दुनिया में
और भरने लग जाती हूँ
अपना पसंदीदा रंग इसमें...


जिधर दिल कहता है
उसी दिशा में चलती हूँ...
जो मन में आता है
वही चित्र बनाती हूँ...
और तब तक अपना paint-brush चलाती हूँ
जब तक
दिल-दिमाग़ शांत न हो जाए
और वो बोझ न हट जाए,
भीतर से निकल न जाए...

जो लेकर मैं
इस सफ़ेद आसमाँ के पास आई थी.....!!!

Desire ब्लॉग से मेरी बहन पूजा शर्मा की एक बेहतरीन रचना आपके साथ साँझा कर रहा हूँ .....उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

@ संजय भास्कर


सोमवार, 29 अप्रैल 2013

एक मुलाकात -- डॉ निशा महाराणा


सुबह का समय था
दिवाकर सात घोडों के रथ पे
होके सवार
अपनी प्रिया से मिलकर
आ रहा था
पवन हौले-हौले पेड की डालियों औ
पत्तों को प्यार से सहला रहा था
समाँ मनभावन था अचानक-
मेरी आँखें उसकी आँखों से मिली
उसने मुझको देखा
मैनें उसको देखा
मैं आगे बढी
उसने पीछे से  मारा झपट्टा
औ पकड लिया मेरा दुपट्टा
मैं पीछे मुडी उसे डाँटा
वो भागा पर-------
पुनः आगे आकर
मेरे रास्ते को रोका
औ मेरी आँखों में झाँका
उसकी आँखों में झाँकते हुये
महसुस हुआ
उसका प्यार बडा ही सच्चा था क्योंकि वो---------
आदमी नहीं बंदर का बच्चा था !!

My Expression ब्लॉग से डॉ निशा महाराणा जी की एक बेहतरीन रचना आपके साथ साँझा कर रहा हूँ .....उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

@ संजय भास्कर


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